Wednesday, 19 March 2014

      


कठपुतलिया
मनीषा कुलश्रेष्ठ



सुगना जब-जब कोठरी के अंदर-बाहर जाती, दरवाज़े के पीछे लटकी कठपुतलियां उससे टकरा जातीं... उसे रोकतीं अपनी कजरारी, तीखी, फटी-फटी आंखों से, चमाचम गोटे के लहंगों वाली रानियां, नर्तकियां और अंगरखे-साफे वाले, आंके-बांके, राजा-महाराजा और घोड़े पर सवार सेनापति। ढोलकी वाला विदूषक और सारंगी वाली उसकी साथिन। दीवाना मजनूं और नकाब वाली उसकी लैला। कभी सुगना उदास होती तो इन कठपुतलियों का एक साथ ढेर बनाकर ताक पर रख देती और सांकल लगाकर गुदड़ी पर ढह जाती। कभी गुस्सा होती तो ज़ोर से झिंझोड़ देती सबके धागे। कुछ मटक जातीं, एक दूसरे में अटक जातीं। किसी नर्तकी की गर्दन उसी के हाथों में उलझ जाती। कोई राजा डोर से टूट मुंह के बल गिरा होता। ढीठ मालिन टोकरी समेत उसके ऊपर। प्यार आता तो उनके धागे सुलझाती, टूटे जेवर ठीक करती, उधड़े गोटे-झालर सींती या नए कपड़े बनाती।
कभी-कभी वह अपने हाथ-पैर देखती तो उसे लगता उनमें भी एक अदृश्य डोर बंधी है। उसे महसूस होता किज्ञ् ये जो वक्त है न, नौ से चार बजे का, वह दो प्रस्तुतियों के बीच परदा डाल के मंच के पीछे लटका दी गई कठपुतली के आराम का समय है। अब होती हैं कुछ दीवानी कठपुतलियां, देह के साथ-साथ मन भी पसारने वाली। वह भी वैसी ही एक बावरी कठपुतली है... जो डोरों से मन को विलग कर नया खेल रचती है। सूत्रधार की समझ से परे का खेल। कुछ मौलिक कुछ अलग जो जीवन का विस्तार दे जिसमें उसकी अलग भूमिका हो, इंतज़ार करती बीवी, बच्चे पालती मां से एकदम अलग। अपनी देहगंध से बौराती, अपने मन से संसर्ग का साथी चुनती एक आदिम औरत की सी भूमिका। वह इन अनचाहे रिश्तों के डोरों से उलझकर थक गई है। ये रिश्ते जो उसके ख़ून तक के नहीं हैं। उसके ख़ून के रिश्ते तो कहीं दूर छिटक कर गिर गये हैं। छोटका भाई याद आता... किसी और ड्योढ़ी नाते बैठी मां याद आती। ऐसी ड्योढ़ी जहां से उसे कभी कोई बुलावा नहीं आने वाला। बापू होता तो उसकी कोई तीज यूं सासरे में बीतती?
कितना हंसी थी उसकी सहेलियां, जब उन्हें पता चला था कि उसका ब्याह गांव-गांव जाकर, स्कूलों, मेलों और त्यौहारों, शादी-ब्याह में कठपुतली का खेल दिखाने वाले के साथ तय हुआ है। `तुझे भी नचाएगा वो लंगड़ा कठपुतली बनाकर।' कहकर उसकी पक्की सहेली रूनकी हंसते-हंसते रो पड़ी थी।
धाक धिना धिन धा... चीं... चीं... चीं... अब आ रही है तुर्क के तैमूरलंग की सवारी... चूं%% च्यू%% धिन धिन धा...!
बापू तो कहीं और बात तय कर गये थे, वो जोगेन्दर था... दसवीं फेल था। जीन्स की पेन्ट और लाल कमीज पहनता और धूप का चश्मा लगाता। सब जोगी कहते। पर उनके आंखें मूंदते ही लेन-देन की बात पर बाई ने तीन साल पुराना रिश्ता तोड़ दिया। रिश्ता टूट गया तो जहन में गूंजता नाम भी पीछे छूट गया। तेरह साल की सुगना बाई का ब्याह तीस बरस के अपाहिज और विधुर कठपुतली वाले रामकिसन से हो गया। सुगना के सपने में पैर कटी कठपुतलियां आने लगीं। बापू के मरने के दो साल के अन्दर ही, उसकी बाई ख़ुद जाके पास के गांव के एक खेती-किसानी वाले दूसरी जात के आदमी के घर नाते बैठ गयी थी और अपने संबंध की जल्दी में सुगना का गौना पन्द्रह साल की होने से पहले ही कर दिया, बिना सगुन-सात, लगभग खाली हाथ भेज दिया सासरे। ज़मीन-घर सब बेच के छोटके को लेकर वह चली गयी।
घूंघटे में से ऊंटगाड़ी से उतर कर चलते हुए रामकिसन को देखा था... बलिष्ठ देह के होते हुए भी एक पैर पोलियो की मार ने पतला कर दिया था सो एक हाथ गोड़े पे टिका के हचक-हचक कर चलता था। यूं साइकिल भी चला लेता था... एक पैर से तेज़-तेज़ पैडल मारता, दूसरा पैर सहारे के लिए दूसरे पैडल पर बस ज़रा-सा टिकाता... यह छोटा पैर पहुंचता भी नहीं था दूसरे पैडल तक, पर सायकिल की गति में कमी नहीं आती।
पन्द्रह बरस की सुगना, सात और चार बरस के बंसी और नंदू, जिनकी वो मां बन गई थी। तोते की तरह `मां%', `बाई%%' रटते नंदू-बंसी। वह सोचती कि वो और उसका छोटका भाई तो बाई के सगे बालक थे... जब वो बाई के आगे-पीछे `मांए' या `बाई% ए%' कहते हुए घूमते तो बाई कितना रीस जाती... चिल्लाती... `चो%%प!' सुगना खीजती नहीं थी, पर सुनती भी नहीं थी। वह सोचती कि यह मुझे नहीं, बादलों के पार जा के बसी अपनी मां को पुकारते हैं अभागे।

सहज और अनुभवी रामकिसन ने कोई जल्दबाज़ी नहीं की... इस उन्मुक्त आत्मा को बांधने में। रामकिशन कठपुतलियों के डोरे कसने में माहिर था पर यह कठपुतली तो अद्भुत ही थी। दिन भर तो सोती, रात में भी आठ बजे ही सो जाती... रीत के चलते सात-आठ दिन तो सास ने घर का काम संभाला। नवें दिन मेंहदी फीकी होते ही सास चली गयी अपनी ढाणी पे। सुगना पर पूरी गृहस्थी का भार आ पड़ा। किसी तरह वह कच्चा-पक्का खाना बनाती, हाथ जलाती, छाछ ढोलती, साबुन दो दिन में खतम कर डालती। टाबरों को देर में चाय मिलती तो स्कूल छूट जाता। रामकिसन ने धैर्य नहीं खोया। ख़ुद जल्दी उठकर आधे काम निपटा देता। दोनों टाबरों को स्कूल छोड़कर अपना खाना बांध के, नई कठपुतलियों के सुलझे डोर साइकिल में लटकाता और लंगड़ाते हुए सायकिल पर उचक के बैठता और नौ बजे किसी गांव, मेले या फिर सम की ढाणी में टूरिस्टों के डेरों की राह लेता।
सुगना की हंसी बहुत मोहक थी। उसकी हंसी को डंस लिया था, शतरंज के घोड़े की तरह टेढ़ी चाल चलने वाले सर्प ने। सुगना अपने आप में एक प्राकृतिक मरुस्थलीय सौन्दर्य से भरा-पूरा दृश्य थी। रेतीले धोरों से उठती-ढहती देह की लहरें। लम्बी कद-काठी, सुता हुआ पेट। उस पर गहरे कुएं सी नाभि। मीलों दूर से, सिर पर एक के ऊपर एक तीन गगरियां उठा कर लाने के अभ्यास से चाल की धज देखते बनती थी। लंबी-पतली आंखों में काजल की खिंची हुई लकीर जहां जाकर खत्म होती थी, वहीं टिके थे गोदने के तीन नीले बिंदु। रूखे भूरे केशों में लगी चमकीली रंगीन चिमटियां। आगे के बालों में चोटी में गूंथा गया लाख का बोरला। पीछे चोटी में गिलट की चेन और घुंघरू वाली चोटी पिन। कस के बंधे बालों को भी उड़ा लिये जाती थी मरूधरा की बावरी हवा। चेहरे पर आ जाते बाल। वह खीज जाती।
बात देह की ही तो नहीं थी। मन भी उसका हरा-भरा नखलिस्तान था। कम बोलती, हंसती ज़्यादा। अतिरिक्त संवेदना उसके मन को आर्द्र करती थी, इसलिए बात-बात पर आंसू की झड़ी लग जाती। इसी अतिरिक्त संवेदना के चलते वह रूंखड़ों, पंछियों और डांगरों से बातें करती। उसे चिड़ियों की आवाज़ पार्श्व का स्वर नहीं लगती थी, दृश्य का मुख्य स्वर लगती थी और वह जब-तब इस लोक से कट जाती। आकाश के रंग देख वह भूल जाती कि वह धरती पर खड़ी है। घर उसे काटने को दौड़ता। वह हर दो मिनट में खुले की ओर भागती, कोठरी और रसोई से निकलकर। घर की रसोई से भला उसे घर के आंगन में लगा इकलौता खेजड़े का पेड़ लगता। वह आटे की परात, काचरियों-फलियों और हरी साग और दंराती लेकर वह पेड़ के नीचे बने इस चौतरे पर आ बैठती और खाना बनाने की पूरी तैयारी यहीं करती। लगन के तुरंत बाद, मेंहदी छूटते ही, पहला जो काम उसने किया, वह यही था कि एक पक्की, एक कच्ची कोठरी वाले घर के आंगन में लगे इस खेजड़े के पेड़ को चारों तरफ भाटे लगाकर, चूना-गारा थोप कर, ऊपर से लीप कर उसने गोल सुघड़ चौतरा बना लिया था। खेजड़े पर पंछी आते तो वह खुश हो जाती। मटके के टूटे पेंदे में पानी भर के टांग दिया था, खेजड़े की एक डाल पर प्यासे पंछियों के लिये। मुट्ठी भर बाजरा आंगन में बिखेर देती तो वे चहचहाते हुए नीचे उतर आते।
बंसी का बापू हंस दिया था, उसकी इस हरकत पर। तब उसने उसकी तरफ पहली बार घूंघट हटाकर, उसकी ओर देखकर, हंस कर कहा थाज्ञ् `इस घर को अपना बना रही हूं।' उसी रात उसने अपना आप, बिना नखरों के उस तीस बरस के मनख को सौंप दिया था। सुगना बहुत डरपोक थी। वह मां बनने से डरती थी, उसकी चिन्ता का समाधान रामकिसन ने कर दिया था, `बंसी की पहली मां के सामने ही ढाणी में जैसलमेर के डाकदर-नरस आए थे, कैम्प लगा था। जिस-जिस के दो-दो टाबर थे, सबकी नसबंदी कर दी, जोर-जबर करके, पुलिस का डर दिखा के।'
`और आप...?'
`हां, पर डाकदर साब कहते थे कि आप्रेसन उलट भी सकता है।'
`ना, मत उलटवाना, बंसी-नंदू हैं तो। बच्चे दो ही अच्छे।' सुगना हंसी तो उसकी नाभि में एक गहरा भंवर पड़ गया।
सुगना और रामकिसन की गृहस्थी पटरी पर आ गयी थी। रामकिसन गांव-गांव भटकता तब कहीं गिरस्ती का और बालकों के स्कूल का खर्चा चलता। उसे ऐसा लगता जैसे वह काठ की पुतली बन गई है और अदृश्य डोरे रामकिसन ने सुघड़ता से, बिना उसे महसूस करवाए बांध ही दिये हैं। गृहस्थी के कामों को अब वह एक लय में कर डालती है। वह अब छाछ कम ढोलती। हाथ कम जलाती। साबुन बचा-बचाकर इस्तेमाल करती। धरती की बहुमूल्य देन से विहीन इस गांव में आकर पानी के छपाकों से मुंह धोने की आदत छोड़ दी, बूंद-बूंद पानी बचाती। टाबर `मां ए' बुलाते तो बिना चिहुंके, यंत्रवत समझ लेती। टाबरों को समय पर बाजरे के रोट और गुड़ का नाश्ता करा, उनके दिन का खाना कागज में लपेट कर, स्कूल का बस्ता थमा कर वह घर से भेजती और किवाड़ मूंदती तो ऐसा लगता कि अब जाके उसके डोरे ढीले हो गये हैं, अब सुगना नाम की कठपुतली के शान्त लटके रहने का समय है, दो प्रस्तुतियों के बीच का समय।
वह धम्म से गुदड़ी पर सुन्न होकर पड़ जाती। अपने वजूद को, अपनी देह को हाथ से टटोलती। सोचती-उलझती लेकिन समझ नहीं आताज्ञ् रात किस मुहाने पर जाकर उफन पड़ी थी वह कि रामकिसन एकदम कुंठित हो गया और छिटक गया उससे दूर। पहले देह जब शांत, नदी-सी पड़ी रहती थी तो वह मीलों तैर जाता था। अब वह नैसर्गिक आकांक्षाआें से भरपूर नदी में बदल जाती है और इन्हीं आकांक्षाआें की पूर्ति हेतु प्रसन्न-प्रछन्न क्षमताआें से परिपूर्ण होकर बहती हैज्ञ् प्रबल-प्रगल्भ, तो रामकिसन के लिये मुश्किल हो जाता है इस उफनती नदी को बांहों में भर कर तैरना। बहुत डरपोक थी सुगना, इस बात से भी डर गयी। उसने खुद को काठ कर लिया। अब रामकिसन चाहे जैसे नचाये। वह जब तृपित की डकार लेता, तो वह जूठन के इधर-उधर गिरे टुकड़े समेट, भूखी उठ जाती। फिर भी ज़िन्दगी तो चल ही रही थी। रामकिसन अपने कर्त्तव्यों से कहीं पीछे न हटा। न सुगना ही ने हार मानी। बंसी-नंदू उसे सगी मां से ज़्यादा चाहने लगे थे।
सब कुछ ठीक ही चलता तो कठपुतली वाले रामकिसन की लुगाई सुगना की कहानी चार दिशाआें में क्यों भागती? धणी-धोरे, टाबरों और सासरे वालों के चलते, सुगना यूं अकेली पड़ जाती? वो गयी ही क्यों कुलधरा के उन खण्डहर मकानों और मन्दिरों की तरफ? उस दिन भी टाबर स्कूल भेजकर, सुगना धम्म से कठपुतलियों वाले कोने में गुदड़ियों के ढेर पर ढह गई थी। ऊपर कठपुतलियां हिलती-डुलती, लटकती रहीं। इन कठपुतलियों का पहरा नहीं मानती वह। बाकी वक्त तो एक पहरा सा वह स्वयं पर महसूस करती ही थी, उसे लगता कि उसकी आत्मा तक पर कुछ जोड़ी आंखें गड़ी हैं। लेकिन यहां इस कोने में कठपुतलियों की फटी-फटी कई जोड़ी आंखों से स्वयं को ढंक कर वह अपनी कांचली ढीली करती और देह के इस स्वस्थ मरूस्थल के बियावां धोरों की लहरों पर आंख मूंदकर भटकती। अजीब-अजीब सपने देखती। जब आंख खुलती तो धूप आंगन के बीचोंबीच खड़ी उसे पुकार रही होती।
`बींदणी%% पाणी!'
धापू री बाई! उस दिन उसे देर लग गयी किवाड़ खोलने में, कांचली के उलझी डोरी सुलझा कर कसते-कसते।
`आंख लग गई थी मां सा। आज तो पाणी खत्म...'
`गैला हो गया रामकिसन जो इस जोबन की मारी को ब्याह लाया। दिन चढ़े कोठरी बन्द कर पता नहीं क्या करती है। एक वो थी, कोसल्या... पांच बजे ही तीन कोस दूर पानी के लिये निकल जाती।'
बुढ़िया की गालियां खाती, वह इडोणी, चरू-चरी, मटका लेकर अकेली भागी। पानी मिलने के अनजान लक्ष्य की तरफ। अपनी ढाणी का कुआं और ट्यूबवेल तो पिछले बरस ही सूख चुका था। पास की ढाणी में लगा सरकारी नल कब से बन्द हो गया होगा। वह भागी पिछले दिन जहां धापू उसे साथ लेकर पानी लेने ले गयी थी, कुलधरा के खण्डहरों की तरफ, उस सूनी बावड़ी की दिशा में। पानी से छलछल करती उस चार मील दूर की बावड़ी की तरफ तो मुसीबत आने पर ही गांव की कोई ही लुगाई जाती है। वो भी इतनी धूप चढ़े तो कोई नहीं।
जल्दी-जल्दी पैर बढ़ा, वह हड़बड़ाती हुई बावड़ी पर पहुंची। दोनों चरू-चरी, मटका भर लिये। ठंडा पानी देख नहा लेने का मन हो आया। तीन दिन हो गये थे नहाये। रामकिसन तो बहुत कहा-सुनी होने पर सात दिन में एक बार रात के बचे दो लोटे पानी से नहाता है। कहता हैज्ञ् सुगनी, पानी मत ढोलते ज़्यादा। यहां हमारी ढाणी में रेत से ही इन्सान का रिवाज है।
बताया न, सुगनी बहुत डरपोक है, बात-बात पर ठंडा पसीना बहाती है, सर पर सांय-सांय करते बड़ के पेड़ और उसकी लटकती जटाआें से डर गई। जैसे-तैसे लुगड़ा हटाकर, लहंगा और कुर्ती पहने-पहने, एक चरू अपने ऊपर उलटा और नहा ली। पानी पर पड़ते, अपने हिलते-डुलते प्रतिबिम्ब को देखकर उसे मालन कठपुतली याद आई। मेरा नाम है चमेली... मैं हूं मालन अलबेली, चली आई हूं अकेली बीकानेर से!... रामचन्दर उस शोख कठपुतली को नचाता हुआ बड़ी सुरीली तान में गाता है। वह भी गुनगुनाने लगी। प्रतिबिम्ब फिर हिला। उजाले में अपनी देह देखे बरसों-बरस हो गये। घाघरा ऊंचा कर पैर देखे, गेहुंआ पैर, सुनहरे रोआें वाली पिंडलियां। पानी की धाराआें से टपकती देह को सुखाने पेड़ के नीचे रखे पत्थर पर बैठ गयी। पल भी तो न बीता था कि धप्प से पीठ पीछे कोई गिरा। सुगनी की चीख हलक में... अर् र् र... डाकी बन्दर है कि कोई भूत? उसका कलेजा छाती फाड़कर बाहर ही आने को था।
`ओळखे कोनी कई?' (पहचानती नहीं है क्या?)
मनख-माणस की भारी आवाज़ सुन सुगना ने झट गीला घूंघट काढ़ लिया।
`कुण?'
`ऐ सुगना... भूलगी कै? जोगी, जोगीन्दर।'
अब वह उठ खड़ी हुई। हठात् घूंघट हटा दिया। वही जीनस की पैन्ट। गोरा चेहरा। बलिष्ठ बाजू।
`यहां?'
`अंग्रेजों को कुलधरा दिखाने लाना था न। गाइड की लाइन पकड़ ली है। जैसलमेर किल्ला में अपणा ओफिस है। दूर से पैचाण लिया था मैं ने... पर तू ने नई पैचाणा। हैं!'
सुगना ने मुण्डी हिला दी। भीगी हुई देह पर चिपके लुगड़े को बार-बार खींच रही थी।
`और घर में सब ठीक... टाबर-टूबर?' उसकी देह पर बार-बार तितली सी जा बैठती नज़र को हटाकर, मुंह फेरकर औपचारिक हो गया जोगी।
`हां!'
`तू नहीं बदली... वैसी च है...। मैं...?'
सुगना ने ध्यान से जोगी को देखा। गबरू! एक ही शब्द निकलकर आत्मा पर जा बिंधा। वह उठ गयी और चरू-मटका उठाने के लिए हल्का घूंघट खींच सर पर ईडोणी रखकर जोगी को उठवाने के लिए इशारा किया। जोगी ने मटका, कलसी और चरू सुगना के सिर पर रखी इडोनी पर आहिस्ता से एक-एक कर रखे। वह नाक ते घूंघट निकाले, पलके झुकाए एक सुनिश्र्चित ताल में लहराती सीढ़ियां चढ़ गई। जोगी हतप्रभ देखता रह गया। रेतीले टीबों वाला छोटा रास्ता पकड़ने को उसके पैर जितना जल्दी चलना चाहते, मन उतना पीछे को लौटता। 
बाई गाली-गलौज के साथ झगड़ी न होती, लेन-देन की बात पर जोगी का बाप न अटका होता तो जोगी उसका पति होता। उसकी पक्की सहेली रूनकी ने कहा तो था, `सुगनी मैंने सुना रामकिसन ने दो हजार उलटे तेरी बाई के ही हाथ पे रखे हैं।' तभी तो जोगी जैसा बांका जवान छुड़ा के लंगड़ा रामकिसन... उसे स्वयं पर गुस्सा आया विरोध क्यों नहीं किया मां का? काठ की पुतली ही रही रे तू सुगनी।
`अंग्रेजों को बस में बिठा के मिलता हूं।' वह पीछे दौड़कर आया।
सुगना का चेहरा तटस्थता से पथरीला हो रहा था। वह कुछ नहीं बोली तो नहीं ही बोली। बस एक नज़र भर उस ओर देखा और गहरी सांस ली। जोगी की आंखों की परिधियों से कोई जंगल शुरू हो रहा था। एक छवि उभरी, किराए की तलवार लटकाए, मोेड़ बांध कर घोड़े पे बैठा जोगी। या फिर दूध-हल्दी भरी परात में अंगूठी खोजते दो जोड़ी हाथ, उसके घूंघट पर पड़ती उस उद्दाम पौरुष की छांह। पुराने तेल पिये काले काठ के पलंग पर रेशमी बिछौना... आले में रखा दिया, बालों भरी छाती जो उसकी सफेद कमीज के खुले बटन से झांकती बस अभी देखी है। रेगिस्तान की जलती रेत पर तीन गागर उठाए चल रही थी वह और मन की केसरिया क्यारियों में अपूर्ण इच्छाआें के जामुनी फूल एक-एक कर खिले जा रहे थे। चांदनी बिछ गयी थी पैरों में, सर पर जैसे बादल रखे थे।
उसकी गेहुंआ देह अपने ही पसीने से लथपथ हो गयी थी, आधा कोस चलकर ही। अचानक पश्र्चिम की तरफ से आसमान का कोना धुंधलाया। उसी कोने की धरा से रेत ऊपर को उठी, मानो नीले आसमान ने जबरन धरा को बाजुआें में भरना चाहा हो और महज़ गुबार हाथ आए हों। जब वह बावड़ी से चली थी तो आंधी के कोई आसार नहीं थे। साफ आसमान से देह को झुलसाती धूप बरस रही थी। हवाआें की चीख से रेत में जाने कहां जड़ धंसाए खड़े खेजड़े के पेड़ कांपे। कुलधरा गांव के दूर तक फैले खण्डहरों के पत्थर तक सहम गये। बौरा गई थी हवा। बगूले ही बगूले गोल-गोल चक्कर काटते। धापू सही कहती थी, ये जगह भुतहा है। आंखें किरकिरी हुइंर्, फिर चेहरा, होंठ यहां तक कि सांसें और भीगी हुई जुबान तक किरकिरा गई। सुगना एक ठूंठ से खेजड़े के नीचे ठिठक गई। चरू-कलशी नीचे मोटे भाटे के सहारे टिका दिये। सर से लुगड़ा उखड़ कर फरफराने लगा। कुर्ती-कांचली में अटका छोर छूट गया। बस घाघरे में अटका छोर छुड़ा पाता तो यह लुगड़ा तेज़ हवाआें के साथ कहीं परदेस ही जा उड़ता। गुलाबी छींट का लुगड़ा। किसी मूमल का या किसी मारू का! उसने उसे खींच कर मुंह पर लपेट लिया, पेड़ से चिपक कर खड़ी हो गयी। सामने वाले धोरे से दो ऊंटवाले आनन-फानन में उतर रहे थे, सुगना ने मुंह फेर लिया। एक भेड़ चरानेवाला किशोर चरवाहा, उसी के पास आ खड़ा हुआ। उसकी भेड़ के पास गोल झुण्ड बनाकर, गोले के केन्द्र में मेमनों को रख, मुंह छिपा कर अनुशासित हो बैठ गई। तेज़ चक्रवात से, रेत की लहरों में हुई उथल-पुथल में न जाने कितने रेतीले रेंगने वाले जानवर निकल कर लम्बी घास की तरफ भागे। एक टेढ़ा-मेढ़ा रेंगने वाला, लहराकर चलता, रेत का पीला सर्प भेड़ों के झुण्ड की तरफ बढ़ा। भेड़ों का शान्त झुण्ड उठकर मिमियाने लगा। किशोर चरवाहा आंधी में ही अपनी भेड़ों को पुकारता इधर-उधर भागने लगा। वो दोनों ऊंट वाले न केवल उस मासूम पर हंसने लगे, उसे लेकर भी अश्लील बातें करने लगे। वह स्तब्ध खड़ी थी। बुरी तरह आशंकित।
अचानक दो बाजुआें ने उसे खींचकर उसे पेड़ से दूर किया। वह पीला सर्प खेजड़े की डाल पर अटका हुआ लटक रहा था। उसकी चीख निकल गयी।
`चलो यहां से।' धुंधलके में उसने देखा, जोगी था।
`जोगी! पर कहां?'
`कहीं भी...'
`नहीं, आंधी थमते ही घर का रास्ता लेना है।'
`अरे! गैली हुई है क्या? इन ऊंटवाले स्मगलरों के साथ, यहां अकेली तूफान में क्या करेगी?' 
वह उसके चरी मटके उठाकर चलता गया। सुगना पीछे पीछे। अनजान पगडंडियों पर चलते-चलत, वे ढेर सारे नीम के पेड़ों से ढंके, सुनसान पड़े एक भैरूं बाबाजी के मंदिर के खण्डहर तक पहुँचे।
`यह जगह ठीक है सुगना? चल यहीं इंतजार करें आंधी थमने का।' वह उसका हाथ थाम ऊंची-ऊंची सीढ़ियां चढ़ने लगा। `मैं अंग्रेजों को बस में बिठा ही रहा था कि आंधी सुरू... मैं समझ गया कि तू फंसी होगी इस पीली आंधी में।' सुगना की सांस अब तक तेज़ चल रही थी।
जोगी की आंखों का जंगल करवटें ले रहा था। जहां घनी लताएं थीं, बहता पानी था, भागते कस्तूरी मृग थे। एक अपनी खुश्बू थी जंगल की। भूख जग आई थी। सुबह से खाया ही क्या था?
पास के झाड़ से टीमरू तोड़ने लगी। जोगी तूफान से नीचे गिर पड़े शहद के छत्ते की तरफ बढ़ा। मक्खियां अब तक भिनभिना रही थीं।
`ऐ मत खा ये जंगली फल, ले यह शहद।' जोगी के हाथ में एक टूटे छत्ते का खोखल था जिसमें से शहद टपक रहा था। `खा न, ये वनमाखी का काढ़ा हुआ नीम का शहद है। वनमाखी जितना तेज़ काटती है उतना मीठा शहद बनाती है। पर यह मीठा शहद पीछे से एक तीतापन छोड़ जाता है।'
आंधी तो रुक गयी थी मगर शहद और तुर्शी दोनों के मिश्रित स्वाद के लालच की एक ही डोर से दोनों बंधे रह गये। सुगना के अन्दर की कठपुतली सांस लेने लगी थी। जोगी ने वह छत्ते का टूटा खोखला हाथ से ऊंचा किया और सुगना के सूखे होंठों पर शहद की टपकती धार डालने लगा। उसके होंठ शहद से भीग गये थे। खोखल से शहद जगह-जगह से टपक रहा था। चेहरा, गर्दन, कांचली के गले की काट का वह छोर जहां से फिर जंगल। जोगी बेशर्मी से हंसने लगा। शहद का छत्ता, एक घना जंगल, गले में किरकिराती रेत, अनगिनत पगडंडियां, घने जंगल में छिपा झरना। खुल कर भूख लगी थी। फिर टिमरू तोड़ के खा लिए सुगना ने पास की झाड़ से। जहरीले थे या नहीं वे जंगली फल, नशीले ज़रूर थे। सुगना का होश खोने लगा।
उसके बिवाई फटे पैर के अंगूठे को चूम ही रहा था जोगी कि उसे ज़ोर की उबकाई आई। जोगी ने घबराकर उसके गले में अपनी दो उंगलियां डाल उल्टी करवा दीज्ञ् 
`मना किया था न, टीमरू - जंगली टीमरू में फरक होता है।'
`तुझे सूग (घिन) नहीं आती कभी पैर का अंगूठा, कभी मेरी उल्टी...'
`तुझसे सूग? तू तो केवड़े का झड़ है। कंटीला मगर महकता हुआ सुगन्ध से। एक बार सुगनी बस गलती हो गई कि तुझे भगा के नहीं ले जा सका, अब तुझे नहीं छोड़ना है।'
`क्यों तेरा भी तो ब्याव-गौना हुआ है, मैंने सुना।'
`वो अपनी जगह रहे। सासरे में। तुझे जैसलमेर रखूंगा।'
कसके, घने बालों वाली छाती से उसे चिपकाता रहा जोगी। जिसके छाती के बालों के डंक पूरी देह पर लेकर लौटी थी सुगना। शहद और डंक, दंश की एक तीक्षणता देह दुखा रही थी। वहीं शहद का तीतापन, दंश लगे हिस्सों पर जलन पैदा कर रहा था।
जब वह घर पहुंची रास्ता ढूंढती हुई और रेत से किरकिराता हुआ पानी मटकों में लेकर, तो बहुत देर हो चुकी थी। सांझ ढलने को आई थी। दोनों टाबर बस्ता बाहर ही छोड़कर भूखे-प्यासे रेत में खेल रहे थे। उसे देखते ही `बाई!' कहकर लिपट गये। साइकिल बाहर खड़ी थी, जिसके हैंडिल में उलझी हुई, रेत भरी कठपुतलियां यूं ही लटकी हुई थीं, उन्हें उतार कर कोठरी तक में नहीं रखा गया था। रामकिसन आंगन के चूल्हे से जूझता हुआ, हांडी में बाजरे की राबड़ी पका रहा था। बहुत ठंडी आवाज़ और लाल आंखों से उसने पूछाज्ञ् कहां रह गई थी?
`कुलधरा की तरफ पानी लेने गई थी। रास्ते में तूफान आ गया। फिर रस्ता भी भूल गयी।'
`सच में ही तूफान आ गया और रास्ता भूलगी? (उसके कहे में, सच में व्यंग्य था या सुगना ही दूसरा व्यंजित अर्थ पकड़ रही थी।) कुलधरा! वो भुतैली बावड़ी? पागल हुई क्या? किसने बताया तुझे उधर का रस्ता?'
`धापू...'
`धापू! वाह री धापू की बहना! किस तूफान में फंस गी जाके तू?' फिर व्यंग्य! सुगना का मन हल्के-हल्के कांप रहा था। किसी ने देखा क्या? इसको कुछ कहा क्या?
रामकिसन की अप्रत्याशित चुप्पी या फिर व्यंग्य से सने दो-एक वाक्य सुनते-सहते, स्वयं को भुलाकर, उसने आंधी से बिखरा पूरा घर बुहारा-समेटा। भीतर से वह अपने आपको भी समेटने का असफल यत्न कर रही थी। रात को टाबरों को खाट पे सुला कर, हाथ-मुंह धोकर कपड़े बदलने को हुई तो देखा जहां-जहां शहद गिरा था, वहां-वहां कुर्ती का रंग उड़ गया था। कांख चिपचिपा रही थी, कान तक के अन्दर चिपचिप! तीन-चार लोटे पानी के भी कम थे उस चिपचिपाहट के लिये।
`इतना पानी क्यों ढोल री है? रेत ही तो है, कीचड़-कादा थोड़े है।' अपनी सूखी ओढ़नी से अच्छी तरह से कान के अंदर तक पोंछ कर आंगन की लालटेन धीमी कर, कोठरी के आले में रखा दिया बुझाकर, दरवाजों की दरारों में कपड़े ठूंस कर वह रामकिसन की बगल में ज़मीन पर बिछी गुदड़ी पर जा लेटी। तमाम व्यंग्य बाणों के बीच भी रामकिसन का नीचे बिस्तर बिछाना उसे समझ नहीं आया। जब टाबरों को ऊपर प्यार से सुला, रामकिसन नीचे उसकी गुदड़ी बिछा कर लेटता है तो उसका मंतव्य सुगना तुरंत समझ जाती है। उस रात रामकिसन उसके प्रति निर्मम था। उसी दौरान दो जोड़ी शहद के रंग की आंखें और मुड़ी हुई पलकों की वह अधखुली चिलमन उस पर बिना झंपे तारी न हो गई होतीं तो वह उस एक जंगल से कैसे गुज़रती? न गुज़रती उस जंगल से तो यह सरासर बलात्कार होता। सह गई वह रामकिसन की सारी निर्ममता, अपने भीतर करवटें लेते जंगल के चलते। उसने कब देखा था घनेरा जंगल। बस मीलों-मील फैले मरूस्थल देखे थे। पीली और काली आंधियों में भी उन पर टिके पुराने खण्डहर जैसे-तैसे सांस लेते थे। और इन खण्डहरों में लटके वनमाखी के मीठे शहद भरे छत्ते। `मीठा तो होता है इसका शहद पर तीतापन पीछे छोड़ जाता है।' यही कहता था न जोगीड़ा!
रामकिसन का गांव-गांव जाकर कठपुतली का खेल दिखाना नहीं रुका, कुलधरा से उसका पानी लाना नहीं रुका। जोगी का विदेशी और देसी टूरिस्टों को कुलधरा रोज लाना कैसे रुकता? कुलधरा के रहस्यमय खण्डहर, अंग्रेज हैरानी से देखते, कैसे पूरा का पूरा गांव एक ही रात में गायब हो गया था। जलते चूल्हे, चलती चक्कियां छोड़, दरवाजे खुले छोड़, अनाज भरे कुठार यूं के यूं छोड़ गांव का गांव गायब हो गया। कहां? पता नहीं। बहुत रहस्यमय है जैसलमेर जिले का यह कुलधरा गांव। जोगी टूटी-फूटी अंग्रेजी और पर्यटन विभाग के छपे पन्नों से उन्हें बताताज्ञ् सर... लुक हियर मैडम... दोज विलेजर्स वर राजपूत वॉरियर्स... वन डे सडनली दे लेफ्ट द विलेज... इन सेम कण्डीसन, सेम एज यू आर लुकिंग हियर...
जल्दी ही गर्भवती होने का अहसास... चींटीयों सा उसे काटने लगा था। रामकिसन के पार्श्व में लेटे हुए उसे लगता गर्म रेत पर लेटी है वह। देह के आकार का वाष्प और तरल भरा गड्ढा भर है वह। पण्डित का फिकरा गूंजाज्ञ् `विधवा, गाभण, रितुमती औरतां, छोड़ी हुई लुगायां हवन सूं आप ही उठ के चली जावो... बुरो मत मानजो सा... भगवान री बनाई रीत है। आरती में कोई भेदभाव नी। आरती के टेम वापस आ सको, अपनी-अपनी श्रद्धा सूं भेंट चढ़ा सको।' अनवरत चल रही आहुतियों के यज्ञ में पति के वामांग बैठी सुगना ठिठकी, सुगना के पेट में चक्रवात उठा। रामकिसन ने मासूम मगर धारदार होने की हद तक ईमानदार बड़ी-बड़ी आंखों से प्रश्न किया और पैर के अंगूठे से उसकी जांघों को कुरेद कर पूछा `क्या हुआ?' वह ढीठ बन गई और रामकिसन के बलिष्ठ हाथ पर अपना हाथ रखकर, यज्ञ में आहुतियां दे आई। बाबा रामदेवजी के मंदिर की ही बात है वह यज्ञ। बाबा रामदेवजी का मेला भरा था। मन्नत पूरी हुई थी रामकिसन की। रामकिसन को जयपुर के एक लोक कला केन्द्र में कठपुतली के खेल दिखाने वाले की स्थायी, सरकारी नौकरी मिल गई थी। वह गांव छोड़ के जाने का मन बना चुका था। सुगना की आत्मा कटघरे में खड़ी थी, अपने आप से दरियाफ्त करती हुई। सुन्न चेतना क्या उत्तर देती? हालातों की क्या समीक्षा करती? जोगी का कई दिनों से कुछ पता नहीं था। वह कई बार कुलधरा जाकर खाली हाथ लौट आई। चींटियों का कोई एक गहरा बिल खुल गया था। कहीं कच्ची, पोली निष्ठा में। वे दिन रात उसकी आत्मा और देह पर रेंगा करतीं।
क्या उत्तर देगी पति को? तीसरा महीना चढ़ गया है। कैसा आलस घेरता है, आजकल उसे। ज़रा चल कर थक जाती है। मन कहीं गहरे गर्त में डूब गया है जाके पर देह यंत्रवत लगी रहती है काम में, जो खाती वह तुरंत उलट देती। पड़ोसन धापू कुछ-कुछ समझ रही थी, कुछ रामकिसन भी। दोनों के दोनों उसकी तुलना में अनुभवी!
`तो ये तूफान था? ऐसी गैल भूलगी थी तूं। धापू अच्छा कुलधरा के खण्डहरों वाली बावड़ी का रास्ता बताया तूने! अब तू ही इसे इसकी मां के घर पटक आ। इस ढोलकी का अब मैं क्या करूं?' 
`वहां कौन बैठा है इसका? तेरा ही बच्चा है ये, कभी प्रेसन खराब हो जाते हैं। इसके मायके में कौन है अब? मां तो खुद नाते बैठी है किसी के। कहां जायेगी रामकिसन ये?'
`इसे भी बिठा दे नाते किसी के, कहना, रखले बच्चे समेत। बोल दे, इसे कि चली जाए उसके पास जिससे ये ढोल गले में बंधा के लाई है। ये कौव्वे और कोयल वाली कहानी खेलने को रामकिसन कठपुतली वाले का ही घर बचा था रांड?' लंगड़ा कर वह घिसटा सुगना की तरफ, हाथ भी उठे रामकिसन के सुगना की पीठ पर बरसने को पर अगले पल ही गिर गये, `साले रामकिसन... लंगड़े... तू आग नहीं बुझा सका इस रांड की?' कहकर रामकिसन क्रोध में मेंड़ की झरती दीवार पर अपना हाथ मारने लगा, आंख से आंसू बहते थे... मुंह से लार।
बात छिपी नहीं। ससुराल की ढाणी तक पहुंची। वहां आकर बवंडर उठा दिया सास ने। सुगना कहती रही यह बच्चा रामकिसन का ही है, तो जाति के पंचों को इकट्ठा करके अग्नि परीक्षा की बात करने लगी सास। रामकिसन जितना चाहता था कि यह मामला तूल न पकड़े, उतनी ही बात घर से बाहर आग की तरह फैल गयी थी। किसी का भी हो चाहे सुगना के गर्भ का बच्चा, वह सुगना को नहीं छोड़ सकता। यह निश्र्चित था कि बच्चा उसका नहीं है, लेकिन कठपुतली नचाते-नचाते रामकिसन जान गया था कि उसकी यह जो मायाविनी-जीवंत कठपुतली है `सुगना'। वह मुक्त भी है, अनुरक्त भी। उसमें त्याग भी है, मोह भी। न सही सती धर्म, लेकिन सेवा है, सहिष्णुता है। उसमें जीवन है, जीवन की हलचल है। मादकता है तो अथाह ममता भी।
वह अंत तक कहता रहा, `बाई, रहने दे मेरा घर उजड़ जायेगा दूसरी बार।' पर सास अडिग थी अग्नि परीक्षा को लेकर। राजस्थान के मरूस्थलीय इलाकों के, अन्दरूनी हिस्से में जहां जातिगत पंचायत ही समस्त कानून व्यवस्था का काम करती है, वहां पुलिस या घरेलू अदालत का क्या काम? समाज को इकट्ठा कर अग्नि-परीक्षा का यह प्रपंच सास के इशारों पर था। रामकिसन कठपुतली वाला तो आज स्वयं कठपुतली था। सास चाहती थी कि फैसले के बाद ही रामकिसन नौकरी पर जाये। टाबरों की चिन्ता न करे, वह संभाल लेगी। ऐसी कौन-सी रूपसी है सुगना, छोड़ देना। मरद है, नाते रख लेना किसी को। बस उस रांड के प्रेमी का पता चल जाये। उससे धरवाएंगे हरजाना, पूरे चार हज्जार!
फैसला होने तक सुगना को पंचायत के एक झोंपड़े में अकेले रहना था तीन दिन, शायद पश्र्चाताप के लिये या ठंडे दिमाग से बिना किसी प्रभाव के अपने निर्णय पर सोचने के लिये। दिन में तो धापू खाना रख जाती। रात को वह उपवास रखती। मटके का ठंडा पानी पीती। दिन भर जैसे वह सुन्न-सी, पालथी मार बैठी रहती, वैसे ही गर्भ का पंछी भी शांत रहता। लेकिन झांेपड़े में रात का अंधेरा जब गहरा और नीरव होता जाता और फूस के फर्श पर खेस बिछा कर लेटे हुए उसकी चेतना जाग उठती, तो गर्भ में वह नन्हा चूजा हल्के-हल्के पंख फड़फड़ाता। एक नन्हीं बच्ची की तमन्ना हौले से जागती, फिर उसे रामकिसन की नई रची कहानी की कठपुतलियां याद आतीं, जो उसने बनाई थीं। जेल में पड़ी देवकी और जोगमाया की कठपुतलियां। कितना भोला चेहरा जोगमाया का!
रात की नीरवता में बाहर और भीतर के स्पन्दन और सजग हो जाते। कभी दूर कहीं झाड़ी में मादा गोडावण की चूज़ों को दी गई पुचकार भरी झिड़की तक सुनाई देती तो कभी विषधर की सरसराहट स्पष्ट सुनाई पड़ती और रोंगटे खड़े हो जाते। दूर कहीं किसी ढाणी में रात्रि-उत्सव में बजतीं थालियां और अलगोजे की टेर यूं लगती जैसे पास से आ रही हो। रात की सूक्ष्मग्राही निस्तब्धता से उसका यह पहला परिचय था। वह रात भर जाग कर सब कुछ सुनतीज्ञ् शराब पीकर लौटे गांव के छोरों का शोर, किसी आवारा बंजारन की कामुक हंसी, सियारों की हूक।
नवम्बर माह की फीकी-सी सुबह थी। झोंपड़े के बाहर सारा ढोली समाज इकट्ठा था, धापू उसके साथ थी। वह हैरान रह गयी जब धापू ने बताया कि जोगी भी भीड़ में खड़ा है। उसने एक छेद से झांका। पति की आहत नज़र, प्रेमी का भयभीत चेहरा। नंदू-बंसी के कुम्हलाये बदन। 
ससुराल के लोगों की हिकारत भरी मुद्राएं। कुतुहल से तमाशा देखते, कानाफूसियां करते, मज़ाक उड़ाते उसकी ही जाति के लोग-लुगाई।
`धापूड़ी, जाके कह दे उस जोगी को, भग जाये यहां से। किसी को अन्दाज भी पड़ गया तो%%%? हरजाने की बात तो है ही, कूट भी डालेंगे उसे मेरे सासरे वाले।'
फैसला जो होना हो, हो। वह लगातार यही कहेगी कि बच्चा रामकिसन का ही है, और किसी का हो ही नहीं सकता। सुगना की आंख फिर एक छेद से होकर जोगी पर जा टिकीं। वह ढीठ तो धापू के साथ इधर ही आ रहा था और रामकिसन आशंकित हो लगातार उस जोगी को घूरे जा रहा है। माजरा समझ रहा है क्या?
`यहां से चला जो... जोगीड़ा!' उसने जोगी के भारी पैरों की आहट सुनते ही, झोंपड़ी के अन्दर से ही, खड़े होने की कोशिश में, देह के बोझ तले डूबते हुए कहा।
`तू बैठ जा अभी। थक जायेगी। पंच मसवरा कर रहे हैं कि अग्निपरीक्षा कैसे लें। जोगी तू बाहर ही रुक।' धापू ने उसके साथ भीतर आते जोगी को हाथ से ठेल दिया।
`सुगना! सुन, मैं हरजाने के चार हजार लाया हूं, दो हजार में छीनी थी न तू मुझसे उसने, मैं दुगना हरजाना भरूंगा। उसे बोल छाती ठोक के कह दे कि बच्चा तेरा - मेरा है। कोई ज़रूरत नहीं गरम तेल में हाथ डालने की या गरम इंर्ट पकड़ने की। ये पंच अपना फायदा देखते हैं ऐसी चीजों में। औरत का चरितर खराब निकले तो भी पंचों की चांदी, न निकले तो भी उसकी चांदी। दोनों तरफ का पैसा उनको तो मिलता ही है।' वह दरवाजे पर मुंह रख फुसफुसाया सुगना का मुंह कसैला हो गया। वह कुछ नहीं बोली, पर जोगी, वह तो तन-मन-धन का जोखिम उठाकर उसे लेने आया है, न सही धर्म पर उसका राग बंधा था सुगना से। वह फिर तड़फड़ायाज्ञ् `बाहर फटफटी खड़ी है, रोड पे... चुपचाप बाहर आ जा, झोंपड़ी के पीछे लंबी घास है, छिपकर पहुंच रोड पे। सुगना, ए%% सुगनी%% क्या कहती है? क्या कहेगी पंचों से?' 
`हां, जा-जा, जा के तू अपना काम देख। मुझे जो कहना होगा, कह दूंगी। अच्छा तो यह है कि रामकिसन और उसके घरवाले तुझे पैचाणे उससे पहले ही चला जा।'
`मैं नहीं डरता उस लंगड़े और उसके घरवालों से। अब भी कह रहा हूं।'
`जोगी तू जा, देख पंच तैयार खड़े हैं, फैसले के लिये।'
`सुगनी, मत पकड़ना रे गरम इंर्ट... फफोले तो पड़ेंगे ही। चाहे तू सही हो के गलत।' चीखते जोगी को धापू ने दूर तक ठेल दिया।
`इतनी बड़ी बातें बता रहा है, अब तक कहां था रे तू?'
`अरे गाईड हूं, आज यहां तो कल टूरिस्ट जहां ले जावे उसके साथ।'
तभी बंसी भागता हुआ आया, `बाई तू हमारे साथ चल न। नंदू तो खाना नहीं खाता तेरे बिना रोता रहता है। एक मां भगवान ने छीनी अब ये दूसरी ये रांड दादी। इसी की करतूत है, बापू तो तुझे चाहता है बाई, रात को रोता था दादी के आगे।' सुगना ने अपना चेहरा घुटनों में छिपा लिया। `बाई, देख न इधर, ये बापू ने भेजा है। तेल है ये, कब्रों पर उगने वाले ग्वारपाठे और रेत की छिपकली का तेल, मल ले हाथ पे, हाथ नहीं जलेगा, न फफोले होंगे। परसों चार घंटे सायकिल चलाकर सीमा पार के नजदीक डटे हुए गाड़िया लोहारों से लाया है, बापू।'
लंबी शीशी के मुंह में ठुंसा कपड़ा खोल के ढेर सारा भूरा बदबूदार तेल सुगना की दोनों हथेलियों पर मलने लगा, बारह बरस का किशोर बंसी। आंधी में अपनी भेड़ें टेरता वो चरवाहा याद आ गया, यही कातरता थी स्वर में। सुगना की आंख भर आइंर्।
पंचों ने आवाज़ लगाई। गर्भभार से क्लान्त, पीले चेहरे वाली सुगना को देख रामकिसन सिसक उठा। सास उसे लानत भेजती रही।
पंचों ने सुगना को गरम इंर्ट पकड़ाने से पहले दरियाफ्त किया, `सुगना बाई कठपुतली वाले रामकिसन के घरवालों का कहना है कि यह बच्चा उसका नहीं है, तुम क्या कहती हो?'
`यह बच्चा बंसी का ही भाई या बहन है। मुझे बंसी के बापू के साथ ही रहना है और आप ही कहो क्या कहूं?' सुगना ने दम बटोरकर कहा। रामकिसन ने गहरी सांस ली। जोगी ने सर को झटका दिया, और बड़बड़ाता हुआ बड़े-बड़े डग भरता हुआ पीछे को चला गया, जहां उसकी काली राजदूत फटफटी खड़ी थी, सुगना को ले जाने के लिये।
`कहो कि `मैंने जो कहा वह सच है, मुझे मंजूर है अग्नि परीक्षा।' सुगना बाई यह अग्नि परीक्षा औरत की मर्जी से ही ली जाती है।' एक पंच बोला।
`बाई, अब नहीं करनी अग्नि परीक्षा, मैं मानता हूं, यह बच्चा मेरा ही होगा।' रामकिसन बीच में आ खड़ा हुआ।
`चुपकर रे... रामकिसना... आप्रेसन के बाद कोई बच्चा होता है? अग्नि परीक्षा तो होने दे। हाथ पे फफोले पड़ें तो इसके मायके वाले या इसके प्रेमी या तो इसे ले जायें या चार हजार जुर्माना दें।' सास ने रामकिसन को यूं धकियाया कि वह गिरते-गिरते बचा।
`तो मंजूर है सुगना बाई?'
सुगना ने उत्तर में तेल मले हाथ आगे कर दिए। एक पंच ने पान का एक-एक पत्ता उन नाजुक हथेलियों पर रखा और उन पर लाल, गरम इंर्ट रख दी गई। एक दो तीन पूरे सात मिनट। आठवें मिनट पर इंर्ट ज़मीन पर फेंक कर सुगना नीचे बैठकर उलटियां करने लगी। पान का पत्ता जल कर काला हो गया था। पास पड़ी पानी की बाल्टी में पांच मिनट डुबो कर हथेलियां ऊपर उठा दीं उसने। फफोले नहीं पड़े थे, पर हथेलियां ताजी रची मेंहदी की तरह लाल सुर्ख थीं।
रेत का गुबार उड़ाती भीड़, शोर के साथ लौटने लगी। पंच फटकार रहे थे सास को।
बाई-बाई करके नंदू और बंसी आकर उसकी पीठ से चिपक गये। धीरे-धीरे हचक कर चलता हुआ रामकिसन उसकी ओर बढ़ रहा था। रोड पर रफ्तार से जाती फटफटी की आवाज़ सुगना के कानों में देर तक गूंजती रही।

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कसबे का आदमी 
- कमलेश्वर


सुबह पाँच बजे गाड़ी मिली। उसने एक कंपार्टमेंट में अपना बिस्तर लगा दिया। समय पर गाड़ी ने झाँसी छोड़ा और छह बजते-बजते डिब्बे में सुबह की रोशनी और ठंडक भरने लगी। हवा ने उसे कुछ गुदगुदाया। बाहर के दृश्य साफ़ हो रहे थे, जैसे कोई चित्रित कलाकृति पर से धीरे-धीरे ड्रेसिंग पेपर हटाता जा रहा हो। उसे यह सब बहुत भला-सा लगा। उसने अपनी चादर टाँगों पर डाल ली। पैर सिकोड़कर बैठा ही था कि आवाज़ सुनाई दी, "पढ़ो पटे सित्तारम स़ित्तारम. . . "
उसने मुड़कर देखा, तो प्रवचनकर्ता की पीठ दिखाई दी। कोई ख़ास जाड़ा तो नहीं था, पर तोते के मालिक, रूई का कोट, जिस पर बर्फ़ीनुमा सिलाई पड़ी थी और एक पतली मोहरी का पाजामा पहने नज़र आए। सिर पर टोपा भी था और सीट के सहारे एक मोटा-सा सोंटा भी टिका था। पर न तो उनकी शक्ल ही दिखाई दे रही थी और न तोता। फिर वही आवाज़ गूँज उठी, "पढ़ो पटे सित्तारम सित्तारम. . ."
सभी लोगों की आँखें उधर ही ताकने लग गईं। आख़िर उससे न रहा गया। वह उठकर उन्हें देखने के लिए खिड़की की ओर बढ़ा। वहाँ तोता भी था और उसका पिंजरा भी, और उसके हाथ में आटे की लोई भी, जिससे वे फुरती से गोलियाँ बनाते जा रहे थे और पक्षी को पुचकार-पुचकारकर खिलाते जा रहे थे। पर तोता पूरा तोता-चश्म ही था। उनकी बार-बार की मिन्नत के बावजूद उसका कंठ नहीं फूटा। गोलियाँ तो वह निगलता जा रहा था, पर ईश्वर का नाम उसकी ज़बान से नहीं फूट रहा था। लौटते में एक नज़र उसने उन पर और डाली, तो लगा, जैसे चेहरा पहचाना हुआ है।
वह अपनी सीट पर आकर बैठ गया। दिमाग़ पर बहुत ज़ोर डाला पर याद नहीं आया। तभी उन्होंने तोते की ओर से दृष्टि हटाकर शिवराज की ओर देखा, अंगूठा और तर्जनी निरंतर एक रफ़्तार से अब भी गोली को शक्ल प्रदान कर रहे थे। माथे पर लहरें डालते हुए और आँखों को गोल कर कुछ अजीब निरीह-सा मुँह बनाकर वे शिवराज को संबोधित करते हुए बोले, "शिब्बू शिवराज है न तू?"
और अपना नाम उनके मुँह से सुनते ही उसे सब याद आ गया। ये तो छोटे महराज हैं।
वे जाति के वैश्य थे, पर कर्म के कारण महराज पुकारे जाने लगे थे। म्युनिसिपालिटी की दूकानों के पासवाली इमली के नीचे बैठकर वे पानी पिलाया करते थे। क़स्बे की सबसे रौनकदार जगह वही थी। वहीं कुएँ पर छोटे अपनी टाँगें तोड़े, जाँघ तक धोती सरकाए, जनेऊ डाले, चुटिया फहराए, नंगे बदन टीन की टूटी कुरसी पर जमे रहते। गाँववाले पानी पीकर एक-आध पैसा उनके पैरों के बीच उसी कुरसी पर रखकर चल देते। पैसा पाकर वह सामर्थ्य-भर आशीर्वाद देते। जब एक कूल्हा दर्द करने लगता, तो दूसरी तरफ़ ज़ोर डालने के लिए थोड़ा-सा कसमसाते और इसमें अगर कहीं कुरसी ने खाल दाब ली, तो तीन-चार मिनिट लगातार कुरसी को गालियाँ देते रहते। लगे हाथों ननकू हलवाई को भी कोसते, जिसने प्याऊ के लिए यह कुरसी दी थी।
तब छोटे महराज की उमर कोई ख़ास नहीं थी, यही 35-36 के क़रीब रही होगी। छोटे महराज के बाप-दादा सोने-चांदी का काम करते थे। काफ़ी पुराना घर था, दूकान थी। पर जब बाप मरे, तो छोटे की उमर बहुत कम थी। माँ पहले ही स्वर्ग सिधार चुकी थीं। बाप के मरने के बाद दूर के रिश्ते की एक चाची आकर सब देखभाल करने लगीं। फिर बहुत बड़ी-सी चोरी हुई और छोटे का घर तबाह हो गया। चाची को तीरथ की सूझी, तो छोटे को साथ लेकर चल दीं। खर्चे की ज़रूरत पड़ने पर एक मुख़्तार से जब-तब रुपए मँगवाती रहीं। छोटे साथ थे, सो रसीद भेजते रहे। आख़िर जब तीरथ से वापस आए, तब पाँच-छह बरस मकान में और रहना हुआ। फिर मुख़्तार ने मूल और ब्याज के बदले एक दिन मकान कुर्क करा लिया, गवाही में छोटे के हाथ की रसीदें पेश कर दीं और औने-पौने में मकान झाड़ दिया। तब से उनकी चाची ने जनाने और अस्पताल में नौकरी कर ली और छोटे बिस्किटों का ठेला लगाने लगे और घूम-घूमकर बाज़ार की सड़कों पर चीखने लगे - 'एक पैसे में पचास, पचास बिस्किट इनाम ज़ितना लगाओगे, उतना पाओगे -'
ठेले में मैदे के छोटे-छोटे बिस्किटों का ढेर लगा रहता। एक कोने पर एक बड़ी-सी फिरकनी रखी रहती, जिस पर नंबर के खाने बने रहते और उस पर एक सुई नाचती रहती। जब कोई पैसा लगाकर घुमानेवाला न मिलता, तो खड़े-खड़े स्वयं घुमाते रहते, जितना नंबर आता, उतने बिस्किट गिनते और फिर ढेर में डालकर अनाज की तरह रोरते रहते। कभी करारे-करारे बीस-पचीस छाँट लेते, सुई घुमाते, अंटी से एक पैसा निकालकर पैसा रखनेवाले फूल के कटोरे में झन्न से मारते और जितना नंबर आता, उतने गिनकर, बाकी ढेर के सुपुर्द कर जलपान कर लेते।
लेकिन इस तरह कैसे पेट पलता। फिर एक होम्योपैथिक डॉक्टर की दूकान को रोज़ सुबह खोलने तथा झाड़ने-पोंछने का काम ले लिया। दो-चार घरों का पानी बाँध लिया। तड़के उठकर चार-चार डोल खींचकर डाल आते और डॉक्टर की दूकान की सफ़ाई आदि करके कोने में पड़े मोढ़े पर इज़्ज़त से दोपहर तक बैठे रहते। डॉक्टर साहब की अनुपस्थिति में मरीज़ों के हालचाल पूछ लेते। कुछ देसी दवाइयों के नुस्खे बताते और जर्मन दवाइयों की अहमियत समझाते।
तभी से छोटे अपने को बहुत-कुछ, एक छोटा-मोटा वैद्य समझने लगे थे। मरीज़ की दशा देखते ही रोग का ऐलान कर देते। तमाम रोगों के इलाज पर उन्होंने दखल जमा लिया था। जब मोतियाबिंद हो जाने के कारण डॉक्टर साहब को दूकान बंद कर देनी पड़ी, तो छोटे अपनी कोठरी में ही एक छोटा-सा औषधालय खोलने का मन्सूबा बाँधने लगे। रतनलाल अत्तार के यहाँ से आठ-दस आने की जड़ी-बूटियाँ भी बँधवा लाए, जिन्हें घोंट-पीस और कपड़छन करके सफ़ेद शीशियों में भरा और ताक में सजा दिया। फ़सली बुखार, हरे-पीले दस्त, नाक-कान-सिर-दर्द की हुक्मी दवाइयाँ बाँटने का ऐलान भी कर दिया। पर गली के परिवारों का सहयोग न मिलने के कारण उन्होंने इस नेक इरादे को छोड़ दिया। सारी हकीमी दवाइयों को थोड़ा-थोड़ा करके चूरन की पुड़ियों में मिलाकर उन्होंने आख़िर अपने पैसे सीधे कर लिए।
इस तरह के न जाने कितने घरेलू धंधे उन्होंने चलाए। जन्म से वैश्य होते हुए भी प्रकृति से परोपकारी होने के कारण उन्हें ब्राह्मणत्व भी प्राप्त करना ही था। इसीलिए जब गली-टोले के लड़कों ने उन्हें प्याऊ पर बैठते देखा और चमकदार काली पीठ पर जनेऊ दिखाई पड़ा, वे वंशगत भावनाओं से अनजान, कर्मगत संस्कारों के आधार पर उन्हें महराज पुकारने लगे। तभी से छोटेलाल छोटे महराज हो गए।
जिस इमली के नीचे वह बैठते थे, उस पर दैव की कृपा से महूक ने छत्ता धर लिया, तो एक दिन अंधियारे पाख में जाकर स्टेशन के पास से एक कंजर पकड़ लाए। छत्ता बटाई पर तै हो गया। पर छोटे महराज शहद का क्या करते। चलते वक़्त उसे कस दिया कि आधे दाम कल आ जाएँ। पर महीना-भर टल गया। झोंपड़ी पर तगादा करने पहुँचे। नगद पैसे तो मिले नहीं, अच्छी-ख़ासी डाँट लगाकर पैसों के बदले में तोता छाँट लिया। कंजर ने मिन्नत की कि तीनों तोते पेशगी दामों के हैं, इस बार जाएगा तो उनके लिए भी पकड़ लाएगा। पर छोटे न माने, दो-चार गालियाँ सुना दीं, तैश में बोले, "मेरे पैसे क्या हराम के थे, वह भी तो पेशगी में से ही हैं, ला निकाल जल्दी इस टुइयाँ को।" और तभी से यह तोता उनके पास है, जिसे जान की तरह चिपकाए रहते हैं।
शिवराज ने प्रसन्नता से उन्हें देखा। 'पालांगे महाराज' कहकर बोला, "इधर निकल आएँ महाराज, बहुत जगह है।"
जब वह पास आकर बैठ गए तो उसने पूछा, "झाँसी किस्के यहाँ गए थे?" "यहीं एक ब्याह था, उसमें आए थे, आना पड़ा अ़पनी कहो लेकिन देख, पहचान कैसा। नज़र कमज़ोर है लला, पर अपने गली-कूचे के पले लोगों की तो महक बहुत अच्छी होती है. . ." और वे धीरे-धीरे गरदन हिलाने लगे। उँगलियों के बीच गोली अब भी नाच रही थी और पिंजरे में बैठा संतू गोली के लालच से मुँह खोलता, आँखें बंद करता, पर बोलता नहीं था।
"बदन तो तुम्हारा एकदम लटक गया है, पहले से चोथाई भी नहीं रहा..." शिवराज बोला। उसे कुछ दु:ख-सा हो रहा था, जब उसने पिछली मरतबा देखा था, तब कितने हट्टे-कट्टे थे। यों उमर का उतार तो था, पर इतना फ़र्क तो बहुत है। भला उमर बने-बनाए आदमी को इतनी जल्दी भी तोड़ सकती है! गाड़ी की चाल धीमी पड़ गई। छोटे महराज ने संतू के पिंजरे को तनिक ऊपर उठाया। उसकी ओर प्यार-भरी दृष्टि से निहारते रहे। तोता कुछ बोला। छोटे महराज के मुख पर मुसकान दौड़ गई। बड़े स्नेह से पुचकारते हुए शिवराज को बताने लगे, "इसका नाम संतू है! यानी संत ज़ब बोले तो बानी बोले, हाँ, संत बानी सित्ताराम!" इतना कहते-कहते वे अपनी ही बात में डूब गए।
गाड़ी रुकी, कोई मामूली-सा स्टेशन था। छोटे महराज ने पेट पर हाथ फेरा और सिर हिलाते हुए बोले, "देखो शिब्बू, कुछ खाने-पीने का डौल है यहाँ?" मिठाईवाला पास से गुज़रा, शिवराज ने रोक लिया। छोटे महराज बोले, "कुछ ठीक-ठाक हो तो पाव-आध पाव...
मिठाई लेकर पैसे शिवराज ने दे दिए। दोनों हाथों में दोना पकड़कर शिवराज के सामने करते हुए वह बोले, "लो शिब्बू, चखो तो ज़रा, अच्छी हो तो पाव-भर और ले लो।"
और इससे पहले कि शिवराज चखे, उन्होंने खुद पोपले मुँह में एक टुकड़ा डालते हुए अपनी राय प्रकट कर दी, "है तो अच्छी ब़ुलाओ उसे।"
शिवराज को बात कसक गई। वह चुप ही बैठा रहा। झाँककर मिठाईवाले को बुलाने की कोई दिखावटी चेष्टा भी उसने नहीं की। पर जैसे ही मिठाईवाला फिर गुज़रा, उनकी दृष्टि पड़ गई। उसे रोकते हुए बोले, "हाँ भाई, ज़रा पाव-भर और देना तो।" फिर शिवराज की ओर मुख़ातिब होकर बोले, "ले लो, शिब्बू असल में बात यह है कि मुझसे अब कोई ऐसी-वैसी चीज़ तो खाई नहीं जाती, दाँत ही नहीं रहे। खोया-वोया थोड़ा आसान रहता है न।" कहकर उन्होंने निष्काम भाव से खाना शुरू कर दिया।
पैसे उसने फिर दे दिए। खाते समय छोटे महराज का निरीह-सा मुँह और एकदम सट जानेवाले जबड़े देखकर उसे रहम आ गया। उनकी झुकी गरदन, बार-बार पलकों का झपकना और ज़रा-ज़रा करके खाना, जैसे सारे कार्य और तन की सारी भाव-भंगिमाओं में लाचारी थी। उन्होंने एक टुकड़ा पिंजरे में डाल दिया। तोते ने खा लिया। पुचकारते हुए उन्होंने फिर एक टुकड़ा डाल दिया। वे स्वयं खाते रहे और संतू को खिलाते रहे। फिर बात चल निकली और उसी के मध्य उनका स्टेशन भी आ गया।
स्टेशन से बाहर आने पर शिवराज और छोटे महराज एक ही इक्के में बैठ गए। दो सवारियाँ और हो गईं। इक्का चला तो हचकोला लगा। छोटे महराज अपने तोते के पिंजरे को पटरे से बाहर लटकाए किसी तरह बैठे रहे। अस्पताल के पास वह इक्के से उतर पड़े। संतू का पिंजरा पटरी पर रख दिया और झोले में से कुछ निकालते हुए कहने लगे, "मैं यहीं उतर जाता हूँ। चाची को ब्याह का हालचाल बताकर कोठरी पर आऊँगा! हाँ, तुमसे एक काम है। ये एक कपड़ा है सिलक का, वहीं शादी में मिला था। मेरे तो भला क्या काम आएगा, तुम अपने काम में ले आना!" बात खतम करते-करते वह कपड़ा झोले से निकालकर शिवराज की गोद में रख दिया।
शिवराज ने लेने से इनकार कर दिया। पर वे नहीं माने। शिवराज भी नहीं माना, तो बड़े झुंझलाकर कपड़ा इक्के में फेंककर संतू का पिंजरा, झोला और सोंटा लेकर बड़बड़ाते चल दिए, "अरे पूछो म़ेरे किसी काम का हो तो एक बात भी है। ज़िंदगी-भर में एक चीज़ दी, उससे भी इनकार स़ब वक्त की बातें हैं, रहम दिखाते हैं मुझ पर, तेरे बाप होते तो अभी इसी बात पर चटख जाती।" फिर मुड़कर ऊँचे स्वर में बोले, "पैसे नहीं हैं मेरे पास, इक्केवाले को दे देना।" और वे जनाने अस्पताल के फाटक में गुम हो गए।
दूसरे दिन सवेरे छोटे महराज अपनी कोठरी में दिखाई दिए। देहरी पर बैठे-बैठे कराह रहे थे। कभी-कभी बुरी तरह से खाँस उठते। साँस का दौरा पड़ गया था। गली से शिवराज निकला तो पिछले दिन वाली बात के कारण उसकी हिम्मत कुछ कहने की नहीं पड़ी। सोचा कतराकर निकल जाए, पर पैर ठिठक रहे थे। तभी हाँफते-हाँफते छोटे महराज बोले, "अरे शिब्बू!" फिर कराहकर टुकड़े-टुकड़े करके कहने लगे, "दौरा पड़ गया है, कल रात से, हाँ, अब कौन देखे संतू को। बड़ी ख़राब आदत है इसकी, गरदन सलाख से बाहर कर लेता है। रात-भर बिल्ली चक्कर काटती रही, बेटा। छन-भर को पलक नहीं लगी। अपने होश-हवास ठीक नहीं तो कौन रखवाली करे इसकी। अपने घर रख लो, बेफ़िकर हो जाऊँ।"
और इतना कहकर बुरी तरह हाँफने लगे। गले में कफ़ घड़घड़ा आया, तो औंधे होकर लेट रहे। पीठ बुरी तरह उठ-बैठ रही थी। शिवराज 'अच्छा' कहकर पिंजरा उठाकर चलने लगा, तोते को एक बार पूरी आँख खोलकर उन्होंने ताका। उनकी गंदली-गंदली आँखों में एक अजीब विरह-मिश्रित तृप्ति थी। जैसे किसी बूढ़े ने अपनी लड़की विदा कर दी हो। सिर नीचा करके उन्होंने एक गहरी साँस खींची, जैसे बहुत भारी ऋण से उऋण हो गए हों।
तीन-चार दिन हो गए थे। छोटे महराज की हालत ख़राब होती जा रही थी। अकेले कोठरी में पड़े रहते। कोई पास बैठनेवाला भी नहीं था। चौथे दिन हालत कुछ ठीक नज़र आई। सरककर देहरी तक आए। घुटनों पर कोहनियाँ रखे और हथेलियों से सिर को साधे कुछ ठीक से बैठे थे। कभी कराह उठते, धाँस लगती तो खाँस उठते। पर उनके चेहरे पर अथाह शोक की छाया व्याप रही थी, जैसे किसी भारी गम़ में डूबे हों। उनकी आँखों में कुछ ऐसा भाव था, जैसे किसी ने उन्हें गहरा धोखा दिया हो, उनके कानों में बार-बार संतू की वह आवाज़ गूँज रही थी, जो उन्होंने दोपहर सुनी थी।
दोपहर संतू की कातर आवाज़ जब शिवराज के बरोठे से सुनाई दी तो वे घबरा गए थे कि कहीं बिल्ली की घात तो नहीं लग गई। बड़े परेशान रहे, पर उठना तो बस में नहीं था। शिवराज के घर की ओर बहुत देर आस लगाए रहे कि कोई निकले, तो पता चले। काफ़ी देर बाद मनुआ तोते के दो-तीन हरे-हरे पंखों का मुकुट बनाए माथे से बाँधे, दो-तीन बच्चों के साथ खेलता दिखाई पड़ा, देखते ही सनाका हो गया। संतू की पूँछ के लंबे-लंबे पंख! किसी तरह बुलाकर पूछा तो पता चला कि मुनुआ को राजा बनना था, सो उसने संतू की पूँछ पकड़ ली। बात की बात में दो-तीन पंख नुच आए।
छोटे महराज का जैसे सारा विश्वास उठ गया। ये लड़का तो उसे मार डालेगा! इस वक़्त तबीयत कुछ ठीक मालूम हुई, बड़ी मुश्किल से उन्होंने अपना डंडा पकड़ा, हिलते-काँपते शिवराज के बरोठे में पहुँचे और अपना तोता वापस माँग लाए। कोठरी में आकर उसकी बूची पूँछ देखते रहे, पर मुँह से कुछ बोले नहीं। संतू को पुचकारा तक नहीं।
शाम हो आई थी। तिराहे पर लालटेन जल गई थी। पूरी गली में उदास अंधियारा भरता जा रहा था। उन्होंने संतू के पिंजरे को भीतर रखकर कोठरी के दरवाज़े उढ़का लिए और फिर नहीं निकले। भीतर कुछ देर तक खुट-पुट करते रहे, फिर रात भर कोई आवाज़ नहीं आई।
सवेरे शिवराज उधर से निकला तो कोठरी की ओर निगाह डाली।
दरवाज़े उसी तरह भिड़े थे। उसने धीरे से खोलकर झाँका, देखा महराज सो रहे थे। चुपचाप धीरे से दरवाज़ा बंद करने लगा, तो गली के रामनरायन बोल पड़े, "क्यों, आज नहीं उठे महराज अभी तक?"
और इतना कहते-कहते उन्होंने पूरे दरवाज़े खोल दिए। दोनों ने ग़ौर से देखा, तोते का पिंजरा सिरहाने रखा था, जिस पर कपड़ा था कि कहीं बिल्ली की घात न लग जाए, परंतु छोटे महराज का पिंजरा खाली पड़ा था, पंछी उड़ गया था।
छोटे महराज ने स्वयं तो नहीं पढ़ा था, पर रामलीला आदि में सुनने के कारण यह उनका पक्का विश्वास था कि अंतिम काल में यदि राम का नाम कानों में पड़ जाए तो मुक्ति मिल जाती है। पता नहीं, उनके अंतिम क्षणों में भी संतू तोते की वाणी फूटी थी या नहीं।
मिठाईवाला पास से गुज़रा, शिवराज ने रोक लिया। छोटे महराज बोले, "कुछ ठीक-ठाक हो तो पाव-आध पाव. . ."
मिठाई लेकर पैसे शिवराज ने दे दिए। दोनों हाथों में दोना पकड़कर शिवराज के सामने करते हुए वह बोले, "लो शिब्बू, चखो तो ज़रा, अच्छी हो तो पाव-भर और ले लो।"
और इससे पहले कि शिवराज चखे, उन्होंने खुद पोपले मुँह में एक टुकड़ा डालते हुए अपनी राय प्रकट कर दी, "है तो अच्छी ब़ुलाओ उसे।" शिवराज को बात कसक गई। वह चुप ही बैठा रहा। झाँककर मिठाईवाले को बुलाने की कोई दिखावटी चेष्टा भी उसने नहीं की। पर जैसे ही मिठाईवाला फिर गुज़रा, उनकी दृष्टि पड़ गई। उसे रोकते हुए बोले, "हाँ भाई, ज़रा पाव-भर और देना तो।" फिर शिवराज की ओर मुख़ातिब होकर बोले, "ले लो, शिब्बू असल में बात यह है कि मुझसे अब कोई ऐसी-वैसी चीज़ तो खाई नहीं जाती, दाँत ही नहीं रहे। खोया-वोया थोड़ा आसान रहता है न।" कहकर उन्होंने निष्काम भाव से खाना शुरू कर दिया।
पैसे उसने फिर दे दिए। खाते समय छोटे महराज का निरीह-सा मुँह और एकदम सट जानेवाले जबड़े देखकर उसे रहम आ गया। उनकी झुकी गरदन, बार-बार पलकों का झपकना और ज़रा-ज़रा करके खाना, जैसे सारे कार्य और तन की सारी भाव-भंगिमाओं में लाचारी थी। उन्होंने एक टुकड़ा पिंजरे में डाल दिया। तोते ने खा लिया। पुचकारते हुए उन्होंने फिर एक टुकड़ा डाल दिया। वे स्वयं खाते रहे और संतू को खिलाते रहे। फिर बात चल निकली और उसी के मध्य उनका स्टेशन भी आ गया।
स्टेशन से बाहर आने पर शिवराज और छोटे महराज एक ही इक्के में बैठ गए। दो सवारियाँ और हो गईं। इक्का चला तो हचकोला लगा। छोटे महराज अपने तोते के पिंजरे को पटरे से बाहर लटकाए किसी तरह बैठे रहे। अस्पताल के पास वह इक्के से उतर पड़े। संतू का पिंजरा पटरी पर रख दिया और झोले में से कुछ निकालते हुए कहने लगे, "मैं यहीं उतर जाता हूँ। चाची को ब्याह का हालचाल बताकर कोठरी पर आऊँगा! हाँ, तुमसे एक काम है। ये एक कपड़ा है सिलक का, वहीं शादी में मिला था। मेरे तो भला क्या काम आएगा, तुम अपने काम में ले आना!" बात खतम करते-करते वह कपड़ा झोले से निकालकर शिवराज की गोद में रख दिया।
शिवराज ने लेने से इनकार कर दिया। पर वे नहीं माने। शिवराज भी नहीं माना, तो बड़े झुंझलाकर कपड़ा इक्के में फेंककर संतू का पिंजरा, झोला और सोंटा लेकर बड़बड़ाते चल दिए, "अरे पूछो म़ेरे किसी काम का हो तो एक बात भी है। ज़िंदगी-भर में एक चीज़ दी, उससे भी इनकार स़ब वक्त की बातें हैं, रहम दिखाते हैं मुझ पर, तेरे बाप होते तो अभी इसी बात पर चटख जाती।"
फिर मुड़कर ऊँचे स्वर में बोले, "पैसे नहीं हैं मेरे पास, इक्केवाले को दे देना।" और वे जनाने अस्पताल के फाटक में गुम हो गए।
दूसरे दिन सवेरे छोटे महराज अपनी कोठरी में दिखाई दिए। देहरी पर बैठे-बैठे कराह रहे थे। कभी-कभी बुरी तरह से खाँस उठते। साँस का दौरा पड़ गया था। गली से शिवराज निकला तो पिछले दिन वाली बात के कारण उसकी हिम्मत कुछ कहने की नहीं पड़ी। सोचा कतराकर निकल जाए, पर पैर ठिठक रहे थे। तभी हाँफते-हाँफते छोटे महराज बोले, "अरे शिब्बू!" फिर कराहकर टुकड़े-टुकड़े करके कहने लगे, "दौरा पड़ गया है, कल रात से, हाँ, अब कौन देखे संतू को। बड़ी ख़राब आदत है इसकी, गरदन सलाख से बाहर कर लेता है। रात-भर बिल्ली चक्कर काटती रही, बेटा। छन-भर को पलक नहीं लगी। अपने होश-हवास ठीक नहीं तो कौन रखवाली करे इसकी। अपने घर रख लो, बेफ़िकर हो जाऊँ।"
और इतना कहकर बुरी तरह हाँफने लगे। गले में कफ़ घड़घड़ा आया, तो औंधे होकर लेट रहे। पीठ बुरी तरह उठ-बैठ रही थी। शिवराज 'अच्छा' कहकर पिंजरा उठाकर चलने लगा, तोते को एक बार पूरी आँख खोलकर उन्होंने ताका। उनकी गंदली-गंदली आँखों में एक अजीब विरह-मिश्रित तृप्ति थी। जैसे किसी बूढ़े ने अपनी लड़की विदा कर दी हो। सिर नीचा करके उन्होंने एक गहरी साँस खींची, जैसे बहुत भारी ऋण से उऋण हो गए हों।
तीन-चार दिन हो गए थे। छोटे महराज की हालत ख़राब होती जा रही थी। अकेले कोठरी में पड़े रहते। कोई पास बैठनेवाला भी नहीं था। चौथे दिन हालत कुछ ठीक नज़र आई। सरककर देहरी तक आए। घुटनों पर कोहनियाँ रखे और हथेलियों से सिर को साधे कुछ ठीक से बैठे थे। कभी कराह उठते, धाँस लगती तो खाँस उठते। पर उनके चेहरे पर अथाह शोक की छाया व्याप रही थी, जैसे किसी भारी गम़ में डूबे हों। उनकी आँखों में कुछ ऐसा भाव था, जैसे किसी ने उन्हें गहरा धोखा दिया हो, उनके कानों में बार-बार संतू की वह आवाज़ गूँज रही थी, जो उन्होंने दोपहर सुनी थी।
दोपहर संतू की कातर आवाज़ जब शिवराज के बरोठे से सुनाई दी तो वे घबरा गए थे कि कहीं बिल्ली की घात तो नहीं लग गई। बड़े परेशान रहे, पर उठना तो बस में नहीं था। शिवराज के घर की ओर बहुत देर आस लगाए रहे कि कोई निकले, तो पता चले। काफ़ी देर बाद मनुआ तोते के दो-तीन हरे-हरे पंखों का मुकुट बनाए माथे से बाँधे, दो-तीन बच्चों के साथ खेलता दिखाई पड़ा, देखते ही सनाका हो गया। संतू की पूँछ के लंबे-लंबे पंख! किसी तरह बुलाकर पूछा तो पता चला कि मुनुआ को राजा बनना था, सो उसने संतू की पूँछ पकड़ ली। बात की बात में दो-तीन पंख नुच आए।
छोटे महराज का जैसे सारा विश्वास उठ गया। ये लड़का तो उसे मार डालेगा! इस वक़्त तबीयत कुछ ठीक मालूम हुई, बड़ी मुश्किल से उन्होंने अपना डंडा पकड़ा, हिलते-काँपते शिवराज के बरोठे में पहुँचे और अपना तोता वापस माँग लाए। कोठरी में आकर उसकी बूची पूँछ देखते रहे, पर मुँह से कुछ बोले नहीं। संतू को पुचकारा तक नहीं।
शाम हो आई थी। तिराहे पर लालटेन जल गई थी। पूरी गली में उदास अंधियारा भरता जा रहा था। उन्होंने संतू के पिंजरे को भीतर रखकर कोठरी के दरवाज़े उढ़का लिए और फिर नहीं निकले। भीतर कुछ देर तक खुट-पुट करते रहे, फिर रात भर कोई आवाज़ नहीं आई।

सवेरे शिवराज उधर से निकला तो कोठरी की ओर निगाह डाली। दरवाज़े उसी तरह भिड़े थे। उसने धीरे से खोलकर झाँका, देखा महराज सो रहे थे। चुपचाप धीरे से दरवाज़ा बंद करने लगा, तो गली के रामनरायन बोल पड़े, "क्यों, आज नहीं उठे महराज अभी तक?"
और इतना कहते-कहते उन्होंने पूरे दरवाज़े खोल दिए। दोनों ने ग़ौर से देखा, तोते का पिंजरा सिरहाने रखा था, जिस पर कपड़ा था कि कहीं बिल्ली की घात न लग जाए, परंतु छोटे महराज का पिंजरा खाली पड़ा था, पंछी उड़ गया था।
छोटे महराज ने स्वयं तो नहीं पढ़ा था, पर रामलीला आदि में सुनने के कारण यह उनका पक्का विश्वास था कि अंतिम काल में यदि राम का नाम कानों में पड़ जाए तो मुक्ति मिल जाती है। पता नहीं, उनके अंतिम क्षणों में भी संतू तोते की वाणी फूटी थी या नहीं।
 

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चंद्रधर शर्मा गुलेरी  CHANRADHER SHARMA GULERI

उसने कहा था 
चंद्रधर शर्मा गुलेरी 





बड़े-बड़े शहरों के इक्के-गाड़ीवालों की जबान के कोड़ों से जिनकी पीठ छिल गई है, और कान पक गए हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बंबूकार्टवालों की बोली का मरहम लगावें। जब बड़े-बड़े शहरों की चौड़ी सड़कों पर घोड़े की पीठ चाबुक से धुनते हुए, इक्केवाले कभी घोड़े की नानी से अपना निकट-संबंध स्थिर करते हैं, कभी राह चलते पैदलों की आँखों के न होने पर तरस खाते हैं, कभी उनके पैरों की अँगुलियों के पोरों को चींथ कर अपने-ही को सताया हुआ बताते हैं, और संसार-भर की ग्लानि, निराशा और क्षोभ के अवतार बने, नाक की सीध चले जाते हैं, तब अमृतसर में उनकी बिरादरीवाले तंग चक्करदार गलियों में, हर-एक लड्ढीवाले के लिए ठहर कर सब्र का समुद्र उमड़ा कर बचो खालसा जी। हटो भाई जी। ठहरना भाई। आने दो लाला जी। हटो बाछा, कहते हुए सफेद फेंटों, खच्चरों और बत्तकों, गन्नें और खोमचे और भारेवालों के जंगल में से राह खेते हैं। क्या मजाल है कि जी और साहब बिना सुने किसी को हटना पड़े। यह बात नहीं कि उनकी जीभ चलती नहीं; पर मीठी छुरी की तरह महीन मार करती हुई। यदि कोई बुढ़िया बार-बार चितौनी देने पर भी लीक से नहीं हटती, तो उनकी बचनावली के ये नमूने हैं - हट जा जीणे जोगिए; हट जा करमाँवालिए; हट जा पुत्तां प्यारिए; बच जा लंबी वालिए। समष्टि में इनके अर्थ हैं, कि तू जीने योग्य है, तू भाग्योंवाली है, पुत्रों को प्यारी है, लंबी उमर तेरे सामने है, तू क्यों मेरे पहिए के नीचे आना चाहती है? बच जा।

ऐसे बंबूकार्टवालों के बीच में हो कर एक लड़का और एक लड़की चौक की एक दुकान पर आ मिले। उसके बालों और इसके ढीले सुथने से जान पड़ता था कि दोनों सिख हैं। वह अपने मामा के केश धोने के लिए दही लेने आया था, और यह रसोई के लिए बड़ियाँ। दुकानदार एक परदेसी से गुथ रहा था, जो सेर-भर गीले पापड़ों की गड्डी को गिने बिना हटता न था।
'तेरे घर कहाँ है?'
'मगरे में; और तेरे?'
'माँझे में; यहाँ कहाँ रहती है?'
'अतरसिंह की बैठक में; वे मेरे मामा होते हैं।'
'मैं भी मामा के यहाँ आया हूँ, उनका घर गुरु बजार में हैं।'

इतने में दुकानदार निबटा, और इनका सौदा देने लगा। सौदा ले कर दोनों साथ-साथ चले। कुछ दूर जा कर लड़के ने मुसकरा कर पूछा, - 'तेरी कुड़माई हो गई?' इस पर लड़की कुछ आँखें चढ़ा कर धत् कह कर दौड़ गई, और लड़का मुँह देखता रह गया।

दूसरे-तीसरे दिन सब्जीवाले के यहाँ, दूधवाले के यहाँ अकस्मात दोनों मिल जाते। महीना-भर यही हाल रहा। दो-तीन बार लड़के ने फिर पूछा, तेरी कुड़माई हो गई? और उत्तर में वही 'धत्' मिला। एक दिन जब फिर लड़के ने वैसे ही हँसी में चिढ़ाने के लिए पूछा तो लड़की, लड़के की संभावना के विरुद्ध बोली - 'हाँ हो गई।'
'कब?'
'कल, देखते नहीं, यह रेशम से कढ़ा हुआ सालू।' लड़की भाग गई। लड़के ने घर की राह ली। रास्ते में एक लड़के को मोरी में ढकेल दिया, एक छावड़ीवाले की दिन-भर की कमाई खोई, एक कुत्ते पर पत्थर मारा और एक गोभीवाले के ठेले में दूध उँड़ेल दिया। सामने नहा कर आती हुई किसी वैष्णवी से टकरा कर अंधे की उपाधि पाई। तब कहीं घर पहुँचा।

2

'राम-राम, यह भी कोई लड़ाई है। दिन-रात खंदकों में बैठे हड्डियाँ अकड़ गईं। लुधियाना से दस गुना जाड़ा और मेंह और बरफ ऊपर से। पिंडलियों तक कीचड़ में धँसे हुए हैं। जमीन कहीं दिखती नहीं; - घंटे-दो-घंटे में कान के परदे फाड़नेवाले धमाके के साथ सारी खंदक हिल जाती है और सौ-सौ गज धरती उछल पड़ती है। इस गैबी गोले से बचे तो कोई लड़े। नगरकोट का जलजला सुना था, यहाँ दिन में पचीस जलजले होते हैं। जो कहीं खंदक से बाहर साफा या कुहनी निकल गई, तो चटाक से गोली लगती है। न मालूम बेईमान मिट्टी में लेटे हुए हैं या घास की पत्तियों में छिपे रहते हैं।'

'लहनासिंह, और तीन दिन हैं। चार तो खंदक में बिता ही दिए। परसों रिलीफ आ जाएगी और फिर सात दिन की छुट्टी। अपने हाथों झटका करेंगे और पेट-भर खा कर सो रहेंगे। उसी फिरंगी मेम के बाग में - मखमल का-सा हरा घास है। फल और दूध की वर्षा कर देती है। लाख कहते हैं, दाम नहीं लेती। कहती है, तुम राजा हो, मेरे मुल्क को बचाने आए हो।'

'चार दिन तक एक पलक नींद नहीं मिली। बिना फेरे घोड़ा बिगड़ता है और बिना लड़े सिपाही। मुझे तो संगीन चढ़ा कर मार्च का हुक्म मिल जाय। फिर सात जरमनों को अकेला मार कर न लौटूँ, तो मुझे दरबार साहब की देहली पर मत्था टेकना नसीब न हो। पाजी कहीं के, कलों के घोड़े - संगीन देखते ही मुँह फाड़ देते हैं, और पैर पकड़ने लगते हैं। यों अँधेरे में तीस-तीस मन का गोला फेंकते हैं। उस दिन धावा किया था - चार मील तक एक जर्मन नहीं छोडा था। पीछे जनरल ने हट जाने का कमान दिया, नहीं तो - '

'नहीं तो सीधे बर्लिन पहुँच जाते! क्यों?' सूबेदार हजारासिंह ने मुसकरा कर कहा -'लड़ाई के मामले जमादार या नायक के चलाए नहीं चलते। बड़े अफसर दूर की सोचते हैं। तीन सौ मील का सामना है। एक तरफ बढ़ गए तो क्या होगा?'

'सूबेदार जी, सच है,' लहनसिंह बोला - 'पर करें क्या? हड्डियों-हड्डियों में तो जाड़ा धँस गया है। सूर्य निकलता नहीं, और खाईं में दोनों तरफ से चंबे की बावलियों के से सोते झर रहे हैं। एक धावा हो जाय, तो गरमी आ जाय।'

'उदमी, उठ, सिगड़ी में कोले डाल। वजीरा, तुम चार जने बालटियाँ ले कर खाईं का पानी बाहर फेंको। महासिंह, शाम हो गई है, खाईं के दरवाजे का पहरा बदल ले।' - यह कहते हुए सूबेदार सारी खंदक में चक्कर लगाने लगे।

वजीरासिंह पलटन का विदूषक था। बाल्टी में गँदला पानी भर कर खाईं के बाहर फेंकता हुआ बोला - 'मैं पाधा बन गया हूँ। करो जर्मनी के बादशाह का तर्पण !' इस पर सब खिलखिला पड़े और उदासी के बादल फट गए।

लहनासिंह ने दूसरी बाल्टी भर कर उसके हाथ में दे कर कहा - 'अपनी बाड़ी के खरबूजों में पानी दो। ऐसा खाद का पानी पंजाब-भर में नहीं मिलेगा।'

'हाँ, देश क्या है, स्वर्ग है। मैं तो लड़ाई के बाद सरकार से दस घुमा जमीन यहाँ माँग लूँगा और फलों के बूटे लगाऊँगा।'

'लाड़ी होराँ को भी यहाँ बुला लोगे? या वही दूध पिलानेवाली फरंगी मेम - '
'चुप कर। यहाँवालों को शरम नहीं।'
'देश-देश की चाल है। आज तक मैं उसे समझा न सका कि सिख तंबाखू नहीं पीते। वह सिगरेट देने में हठ करती है, ओठों में लगाना चाहती है,और मैं पीछे हटता हूँ तो समझती है कि राजा बुरा मान गया, अब मेरे मुल्क के लिए लड़ेग़ा नहीं।'
'अच्छा, अब बोधसिंह कैसा है?'
'अच्छा है।'

'जैसे मैं जानता ही न होऊँ ! रात-भर तुम अपने कंबल उसे उढ़ाते हो और आप सिगड़ी के सहारे गुजर करते हो। उसके पहरे पर आप पहरा दे आते हो। अपने सूखे लकड़ी के तख्तों पर उसे सुलाते हो, आप कीचड़ में पड़े रहते हो। कहीं तुम न माँदे पड़ जाना। जाड़ा क्या है, मौत है, और निमोनिया से मरनेवालों को मुरब्बे नहीं मिला करते।'

'मेरा डर मत करो। मैं तो बुलेल की खड्ड के किनारे मरूँगा। भाई कीरतसिंह की गोदी पर मेरा सिर होगा और मेरे हाथ के लगाए हुए आँगन के आम के पेड़ की छाया होगी।'

वजीरासिंह ने त्योरी चढ़ा कर कहा - 'क्या मरने-मारने की बात लगाई है? मरें जर्मनी और तुरक! हाँ भाइयों, कैसे -

दिल्ली शहर तें पिशोर नुं जांदिए,
कर लेणा लौंगां दा बपार मड़िए;
कर लेणा नाड़ेदा सौदा अड़िए -
(ओय) लाणा चटाका कदुए नुँ।
कद्दू बणाया वे मजेदार गोरिए,
हुण लाणा चटाका कदुए नुँ।।

कौन जानता था कि दाढ़ियोंवाले, घरबारी सिख ऐसा लुच्चों का गीत गाएँगे, पर सारी खंदक इस गीत से गूँज उठी और सिपाही फिर ताजे हो गए, मानों चार दिन से सोते और मौज ही करते रहे हों।

3

दोपहर रात गई है। अँधेरा है। सन्नाटा छाया हुआ है। बोधासिंह खाली बिसकुटों के तीन टिनों पर अपने दोनों कंबल बिछा कर और लहनासिंह के दो कंबल और एक बरानकोट ओढ़ कर सो रहा है। लहनासिंह पहरे पर खड़ा हुआ है। एक आँख खाईं के मुँह पर है और एक बोधासिंह के दुबले शरीर पर। बोधासिंह कराहा।

'क्यों बोधा भाई, क्या है?'

'पानी पिला दो।'

लहनासिंह ने कटोरा उसके मुँह से लगा कर पूछा - 'कहो कैसे हो?' पानी पी कर बोधा बोला - 'कँपनी छुट रही है। रोम-रोम में तार दौड़ रहे हैं। दाँत बज रहे हैं।'
'अच्छा, मेरी जरसी पहन लो !'
'और तुम?'
'मेरे पास सिगड़ी है और मुझे गर्मी लगती है। पसीना आ रहा है।'
'ना, मैं नहीं पहनता। चार दिन से तुम मेरे लिए - '
'हाँ, याद आई। मेरे पास दूसरी गरम जरसी है। आज सबेरे ही आई है। विलायत से बुन-बुन कर भेज रही हैं मेमें, गुरु उनका भला करें।' यों कह कर लहना अपना कोट उतार कर जरसी उतारने लगा।
'सच कहते हो?'
'और नहीं झूठ?' यों कह कर नाँहीं करते बोधा को उसने जबरदस्ती जरसी पहना दी और आप खाकी कोट और जीन का कुरता भर पहन-कर पहरे पर आ खड़ा हुआ। मेम की जरसी की कथा केवल कथा थी।

आधा घंटा बीता। इतने में खाईं के मुँह से आवाज आई - 'सूबेदार हजारासिंह।'
'कौन लपटन साहब? हुक्म हुजूर!' - कह कर सूबेदार तन कर फौजी सलाम करके सामने हुआ।

'देखो, इसी दम धावा करना होगा। मील भर की दूरी पर पूरब के कोने में एक जर्मन खाईं है। उसमें पचास से ज्यादा जर्मन नहीं हैं। इन पेड़ों के नीचे-नीचे दो खेत काट कर रास्ता है। तीन-चार घुमाव हैं। जहाँ मोड़ है वहाँ पंद्रह जवान खड़े कर आया हूँ। तुम यहाँ दस आदमी छोड़ कर सब को साथ ले उनसे जा मिलो। खंदक छीन कर वहीं, जब तक दूसरा हुक्म न मिले, डटे रहो। हम यहाँ रहेगा।'

'जो हुक्म।'

चुपचाप सब तैयार हो गए। बोधा भी कंबल उतार कर चलने लगा। तब लहनासिंह ने उसे रोका। लहनासिंह आगे हुआ तो बोधा के बाप सूबेदार ने उँगली से बोधा की ओर इशारा किया। लहनासिंह समझ कर चुप हो गया। पीछे दस आदमी कौन रहें, इस पर बड़ी हुज्जत हुई। कोई रहना न चाहता था। समझा-बुझा कर सूबेदार ने मार्च किया। लपटन साहब लहना की सिगड़ी के पास मुँह फेर कर खड़े हो गए और जेब से सिगरेट निकाल कर सुलगाने लगे। दस मिनट बाद उन्होंने लहना की ओर हाथ बढा कर कहा - 'लो तुम भी पियो।'

आँख मारते-मारते लहनासिंह सब समझ गया। मुँह का भाव छिपा कर बोला - 'लाओ साहब।' हाथ आगे करते ही उसने सिगड़ी के उजाले में साहब का मुँह देखा। बाल देखे। तब उसका माथा ठनका। लपटन साहब के पट्टियों वाले बाल एक दिन में ही कहाँ उड़ गए और उनकी जगह कैदियों से कटे बाल कहाँ से आ गए?' शायद साहब शराब पिए हुए हैं और उन्हें बाल कटवाने का मौका मिल गया है? लहनासिंह ने जाँचना चाहा। लपटन साहब पाँच वर्ष से उसकी रेजिमेंट में थे।

'क्यों साहब, हमलोग हिंदुस्तान कब जाएँगे?'

'लड़ाई खत्म होने पर। क्यों, क्या यह देश पसंद नहीं ?'

'नहीं साहब, शिकार के वे मजे यहाँ कहाँ? याद है, पारसाल नकली लड़ाई के पीछे हम आप जगाधरी जिले में शिकार करने गए थे -

'हाँ, हाँ - '

'वहीं जब आप खोते पर सवार थे और और आपका खानसामा अब्दुल्ला रास्ते के एक मंदिर में जल चढ़ाने को रह गया था? बेशक पाजी कहीं का - सामने से वह नील गाय निकली कि ऐसी बड़ी मैंने कभी न देखी थीं। और आपकी एक गोली कंधे में लगी और पुट्ठे में निकली। ऐसे अफसर के साथ शिकार खेलने में मजा है। क्यों साहब, शिमले से तैयार होकर उस नील गाय का सिर आ गया था न? आपने कहा था कि रेजमेंट की मैस में लगाएँगे।'

'हाँ पर मैंने वह विलायत भेज दिया - '

'ऐसे बड़े-बड़े सींग! दो-दो फुट के तो होंगे?'

'हाँ, लहनासिंह, दो फुट चार इंच के थे। तुमने सिगरेट नहीं पिया?'

'पीता हूँ साहब, दियासलाई ले आता हूँ' - कह कर लहनासिंह खंदक में घुसा। अब उसे संदेह नहीं रहा था। उसने झटपट निश्चय कर लिया कि क्या करना चाहिए।

अँधेरे में किसी सोनेवाले से वह टकराया।

'कौन? वजीरासिंह?'

'हाँ, क्यों लहना? क्या कयामत आ गई? जरा तो आँख लगने दी होती?'

4

'होश में आओ। कयामत आई है और लपटन साहब की वर्दी पहन कर आई है।'

'क्या?'

'लपटन साहब या तो मारे गए है या कैद हो गए हैं। उनकी वर्दी पहन कर यह कोई जर्मन आया है। सूबेदार ने इसका मुँह नहीं देखा। मैंने देखा और बातें की है। सौहरा साफ उर्दू बोलता है, पर किताबी उर्दू। और मुझे पीने को सिगरेट दिया है?'

'तो अब!'

'अब मारे गए। धोखा है। सूबेदार होराँ, कीचड़ में चक्कर काटते फिरेंगे और यहाँ खाईं पर धावा होगा। उठो, एक काम करो। पल्टन के पैरों के निशान देखते-देखते दौड़ जाओ। अभी बहुत दूर न गए होंगे।

सूबेदार से कहो एकदम लौट आएँ। खंदक की बात झूठ है। चले जाओ, खंदक के पीछे से निकल जाओ। पत्ता तक न खड़के। देर मत करो।'

'हुकुम तो यह है कि यहीं - '

'ऐसी तैसी हुकुम की! मेरा हुकुम - जमादार लहनासिंह जो इस वक्त यहाँ सब से बड़ा अफसर है, उसका हुकुम है। मैं लपटन साहब की खबर लेता हूँ।'

'पर यहाँ तो तुम आठ है।'

'आठ नहीं, दस लाख। एक-एक अकालिया सिख सवा लाख के बराबर होता है। चले जाओ।'

लौट कर खाईं के मुहाने पर लहनासिंह दीवार से चिपक गया। उसने देखा कि लपटन साहब ने जेब से बेल के बराबर तीन गोले निकाले। तीनों को जगह-जगह खंदक की दीवारों में घुसेड़ दिया और तीनों में एक तार सा बाँध दिया। तार के आगे सूत की एक गुत्थी थी, जिसे सिगड़ी के पास रखा। बाहर की तरफ जा कर एक दियासलाई जला कर गुत्थी पर रखने -

इतने में बिजली की तरह दोनों हाथों से उल्टी बंदूक को उठा कर लहनासिंह ने साहब की कुहनी पर तान कर दे मारा। धमाके के साथ साहब के हाथ से दियासलाई गिर पड़ी। लहनासिंह ने एक कुंदा साहब की गर्दन पर मारा और साहब 'ऑख! मीन गौट्ट' कहते हुए चित्त हो गए। लहनासिंह ने तीनों गोले बीन कर खंदक के बाहर फेंके और साहब को घसीट कर सिगड़ी के पास लिटाया। जेबों की तलाशी ली। तीन-चार लिफाफे और एक डायरी निकाल कर उन्हें अपनी जेब के हवाले किया।

साहब की मूर्छा हटी। लहनासिंह हँस कर बोला - 'क्यों लपटन साहब? मिजाज कैसा है? आज मैंने बहुत बातें सीखीं। यह सीखा कि सिख सिगरेट पीते हैं। यह सीखा कि जगाधरी के जिले में नीलगाएँ होती हैं और उनके दो फुट चार इंच के सींग होते हैं। यह सीखा कि मुसलमान खानसामा मूर्तियों पर जल चढ़ाते हैं और लपटन साहब खोते पर चढ़ते हैं। पर यह तो कहो, ऐसी साफ उर्दू कहाँ से सीख आए? हमारे लपटन साहब तो बिन डेम के पाँच लफ्ज भी नहीं बोला करते थे।'

लहना ने पतलून के जेबों की तलाशी नहीं ली थी। साहब ने मानो जाड़े से बचने के लिए, दोनों हाथ जेबों में डाले।

लहनासिंह कहता गया - 'चालाक तो बड़े हो पर माँझे का लहना इतने बरस लपटन साहब के साथ रहा है। उसे चकमा देने के लिए चार आँखें चाहिए। तीन महीने हुए एक तुरकी मौलवी मेरे गाँव आया था। औरतों को बच्चे होने के ताबीज बाँटता था और बच्चों को दवाई देता था। चौधरी के बड़ के नीचे मंजा बिछा कर हुक्का पीता रहता था और कहता था कि जर्मनीवाले बड़े पंडित हैं। वेद पढ़-पढ़ कर उसमें से विमान चलाने की विद्या जान गए हैं। गौ को नहीं मारते। हिंदुस्तान में आ जाएँगे तो गोहत्या बंद कर देंगे। मंडी के बनियों को बहकाता कि डाकखाने से रूपया निकाल लो। सरकार का राज्य जानेवाला है। डाक-बाबू पोल्हूराम भी डर गया था। मैंने मुल्लाजी की दाढ़ी मूड़ दी थी। और गाँव से बाहर निकाल कर कहा था कि जो मेरे गाँव में अब पैर रक्खा तो - '

साहब की जेब में से पिस्तौल चला और लहना की जाँघ में गोली लगी। इधर लहना की हैनरी मार्टिन के दो फायरों ने साहब की कपाल-क्रिया कर दी। धड़ाका सुन कर सब दौड़ आए।

बोधा चिल्लया - 'क्या है?'

लहनासिंह ने उसे यह कह कर सुला दिया कि एक हड़का हुआ कुत्ता आया था, मार दिया और, औरों से सब हाल कह दिया। सब बंदूकें ले कर तैयार हो गए। लहना ने साफा फाड़ कर घाव के दोनों तरफ पट्टियाँ कस कर बाँधी। घाव मांस में ही था। पट्टियों के कसने से लहू निकलना बंद हो गया।

इतने में सत्तर जर्मन चिल्ला कर खाईं में घुस पड़े। सिक्खों की बंदूकों की बाढ़ ने पहले धावे को रोका। दूसरे को रोका। पर यहाँ थे आठ (लहनासिंह तक-तक कर मार रहा था - वह खड़ा था, और, और लेटे हुए थे) और वे सत्तर। अपने मुर्दा भाइयों के शरीर पर चढ़ कर जर्मन आगे घुसे आते थे। थोडे से मिनिटों में वे - अचानक आवाज आई, 'वाह गुरुजी की फतह? वाह गुरुजी का खालसा!! और धड़ाधड़ बंदूकों के फायर जर्मनों की पीठ पर पड़ने लगे। ऐन मौके पर जर्मन दो चक्की के पाटों के बीच में आ गए। पीछे से सूबेदार हजारासिंह के जवान आग बरसाते थे और सामने लहनासिंह के साथियों के संगीन चल रहे थे। पास आने पर पीछेवालों ने भी संगीन पिरोना शुरू कर दिया।

एक किलकारी और - अकाल सिक्खाँ दी फौज आई! वाह गुरुजी दी फतह! वाह गुरुजी दा खालसा ! सत श्री अकालपुरुख!!! और लड़ाई खतम हो गई। तिरेसठ जर्मन या तो खेत रहे थे या कराह रहे थे। सिक्खों में पंद्रह के प्राण गए। सूबेदार के दाहिने कंधे में से गोली आरपार निकल गई। लहनासिंह की पसली में एक गोली लगी। उसने घाव को खंदक की गीली मट्टी से पूर लिया और बाकी का साफा कस कर कमरबंद की तरह लपेट लिया। किसी को खबर न हुई कि लहना को दूसरा घाव - भारी घाव लगा है।

लड़ाई के समय चाँद निकल आया था, ऐसा चाँद, जिसके प्रकाश से संस्कृत-कवियों का दिया हुआ क्षयी नाम सार्थक होता है। और हवा ऐसी चल रही थी जैसी वाणभट्ट की भाषा में 'दंतवीणोपदेशाचार्य' कहलाती। वजीरासिंह कह रहा था कि कैसे मन-मन भर फ्रांस की भूमि मेरे बूटों से चिपक रही थी, जब मैं दौडा-दौडा सूबेदार के पीछे गया था। सूबेदार लहनासिंह से सारा हाल सुन और कागजात पा कर वे उसकी तुरत-बुद्धि को सराह रहे थे और कह रहे थे कि तू न होता तो आज सब मारे जाते।

इस लड़ाई की आवाज तीन मील दाहिनी ओर की खाईंवालों ने सुन ली थी। उन्होंने पीछे टेलीफोन कर दिया था। वहाँ से झटपट दो डाक्टर और दो बीमार ढोने की गाड़ियाँ चलीं, जो कोई डेढ़ घंटे के अंदर-अंदर आ पहुँची। फील्ड अस्पताल नजदीक था। सुबह होते-होते वहाँ पहुँच जाएँगे, इसलिए मामूली पट्टी बाँध कर एक गाड़ी में घायल लिटाए गए और दूसरी में लाशें रक्खी गईं। सूबेदार ने लहनासिंह की जाँघ में पट्टी बँधवानी चाही। पर उसने यह कह कर टाल दिया कि थोड़ा घाव है सबेरे देखा जाएगा। बोधासिंह ज्वर में बर्रा रहा था। वह गाड़ी में लिटाया गया। लहना को छोड़ कर सूबेदार जाते नहीं थे। यह देख लहना ने कहा - 'तुम्हें बोधा की कसम है, और सूबेदारनीजी की सौगंध है जो इस गाड़ी में न चले जाओ।'

'और तुम?'

'मेरे लिए वहाँ पहुँच कर गाड़ी भेज देना, और जर्मन मुरदों के लिए भी तो गाड़ियाँ आती होंगी। मेरा हाल बुरा नहीं है। देखते नहीं, मैं खड़ा हूँ? वजीरासिंह मेरे पास है ही।'

'अच्छा, पर - '

'बोधा गाड़ी पर लेट गया? भला। आप भी चढ़ जाओ। सुनिए तो, सूबेदारनी होराँ को चिठ्ठी लिखो, तो मेरा मत्था टेकना लिख देना। और जब घर जाओ तो कह देना कि मुझसे जो उसने कहा था वह मैंने कर दिया।'

गाड़ियाँ चल पड़ी थीं। सूबेदार ने चढ़ते-चढ़ते लहना का हाथ पकड़ कर कहा - 'तैने मेरे और बोधा के प्राण बचाए हैं। लिखना कैसा? साथ ही घर चलेंगे। अपनी सूबेदारनी को तू ही कह देना। उसने क्या कहा था?'

'अब आप गाड़ी पर चढ़ जाओ। मैंने जो कहा, वह लिख देना, और कह भी देना।'

गाड़ी के जाते लहना लेट गया। 'वजीरा पानी पिला दे, और मेरा कमरबंद खोल दे। तर हो रहा है।'

5

मृत्यु के कुछ समय पहले स्मृति बहुत साफ हो जाती है। जन्म-भर की घटनाएँ एक-एक करके सामने आती हैं। सारे दृश्यों के रंग साफ होते हैं। समय की धुंध बिल्कुल उन पर से हट जाती है।

    ** ** **

लहनासिंह बारह वर्ष का है। अमृतसर में मामा के यहाँ आया हुआ है। दहीवाले के यहाँ, सब्जीवाले के यहाँ, हर कहीं, उसे एक आठ वर्ष की लड़की मिल जाती है। जब वह पूछता है, तेरी कुड़माई हो गई? तब धत् कह कर वह भाग जाती है। एक दिन उसने वैसे ही पूछा, तो उसने कहा - 'हाँ, कल हो गई, देखते नहीं यह रेशम के फूलोंवाला सालू? सुनते ही लहनासिंह को दुःख हुआ। क्रोध हुआ। क्यों हुआ?

'वजीरासिंह, पानी पिला दे।'

** ** **

पचीस वर्ष बीत गए। अब लहनासिंह नं 77 रैफल्स में जमादार हो गया है। उस आठ वर्ष की कन्या का ध्यान ही न रहा। न-मालूम वह कभी मिली थी, या नहीं। सात दिन की छुट्टी ले कर जमीन के मुकदमें की पैरवी करने वह अपने घर गया। वहाँ रेजिमेंट के अफसर की चिठ्ठी मिली कि फौज लाम पर जाती है, फौरन चले आओ। साथ ही सूबेदार हजारासिंह की चिठ्ठी मिली कि मैं और बोधासिंह भी लाम पर जाते हैं। लौटते हुए हमारे घर होते जाना। साथ ही चलेंगे। सूबेदार का गाँव रास्ते में पड़ता था और सूबेदार उसे बहुत चाहता था। लहनासिंह सूबेदार के यहाँ पहुँचा।

जब चलने लगे, तब सूबेदार बेढे में से निकल कर आया। बोला - 'लहना, सूबेदारनी तुमको जानती हैं, बुलाती हैं। जा मिल आ।' लहनासिंह भीतर पहुँचा। सूबेदारनी मुझे जानती हैं? कब से? रेजिमेंट के क्वार्टरों में तो कभी सूबेदार के घर के लोग रहे नहीं। दरवाजे पर जा कर मत्था टेकना कहा। असीस सुनी। लहनासिंह चुप।

'मुझे पहचाना?'
'नहीं।'
'तेरी कुड़माई हो गई - धत् - कल हो गई - देखते नहीं, रेशमी बूटोंवाला सालू -अमृतसर में -
भावों की टकराहट से मूर्छा खुली। करवट बदली। पसली का घाव बह निकला।
'वजीरा, पानी पिला' - 'उसने कहा था।'

** ** **

स्वप्न चल रहा है। सूबेदारनी कह रही है - 'मैंने तेरे को आते ही पहचान लिया। एक काम कहती हूँ। मेरे तो भाग फूट गए। सरकार ने बहादुरी का खिताब दिया है, लायलपुर में जमीन दी है, आज नमक-हलाली का मौका आया है। पर सरकार ने हम तीमियों की एक घँघरिया पल्टन क्यों न बना दी, जो मैं भी सूबेदारजी के साथ चली जाती? एक बेटा है। फौज में भर्ती हुए उसे एक ही बरस हुआ। उसके पीछे चार और हुए, पर एक भी नहीं जिया। सूबेदारनी रोने लगी। अब दोनों जाते हैं। मेरे भाग! तुम्हें याद है, एक दिन ताँगेवाले का घोड़ा दहीवाले की दुकान के पास बिगड़ गया था। तुमने उस दिन मेरे प्राण बचाए थे, आप घोड़े की लातों में चले गए थे, और मुझे उठा कर दुकान के तख्ते पर खड़ा कर दिया था। ऐसे ही इन दोनों को बचाना। यह मेरी भिक्षा है। तुम्हारे आगे आँचल पसारती हूँ।

रोती-रोती सूबेदारनी ओबरी में चली गई। लहना भी आँसू पोंछता हुआ बाहर आया।

'वजीरासिंह, पानी पिला' -'उसने कहा था।'


** ** **

लहना का सिर अपनी गोद में रक्खे वजीरासिंह बैठा है। जब माँगता है, तब पानी पिला देता है। आध घंटे तक लहना चुप रहा, फिर बोला - 'कौन ! कीरतसिंह?'
वजीरा ने कुछ समझ कर कहा - 'हाँ।'
'भइया, मुझे और ऊँचा कर ले। अपने पट्ट पर मेरा सिर रख ले।' वजीरा ने वैसे ही किया।
'हाँ, अब ठीक है। पानी पिला दे। बस, अब के हाड़ में यह आम खूब फलेगा। चचा-भतीजा दोनों यहीं बैठ कर आम खाना। जितना बड़ा तेरा भतीजा है, उतना ही यह आम है। जिस महीने उसका जन्म हुआ था, उसी महीने में मैंने इसे लगाया था।' वजीरासिंह के आँसू टप-टप टपक रहे थे।

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कुछ दिन पीछे लोगों ने अखबारों में पढा -

फ्रांस और बेलजियम - 68 वीं सूची - मैदान में घावों से मरा - नं 77 सिख राइफल्स जमादार लहनासिंह


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